शनिवार, 19 दिसंबर 2009

एक व्यंग्य : अपना अपना दर्द....

एक व्यंग्य : अपना अपना दर्द..
" आइए ! आइए ! स्वागत है भई श्याम; बहुत दिनों बाद इधर आना हुआ"-वर्मा जी ने आगन्तुक का स्वागत करते हुए कहा ।
वर्मा जी ,सचिवालय में लिपिक हैं ,साहित्यिक रुचि रखते हैं,हिंदी में कविता ,कहानी ,उपन्यास आदि पढ़ते रहते हैं।यदा-कदा तुकबन्दी भी कर लेते हैं
और मुहल्ले के कवि-सम्मेलन में सुना भी आते हैं.। इन्हीं गुण-विशेष से प्रभावित होकर ,भाई श्याम उनके मित्र हैं।श्याम जी का जब भी किसी प्रयोजनवश इधर आना होता है तो वर्मा जी से अवश्य मिलते हैं । घंटे दो घंटे बैठकी चलती है ,साहित्यिक चर्चा चलती है.नई कहानियों के बारे में मत-सम्मत प्रगट किए जाते है । समझिए कि वर्मा जी ,भई श्याम के ’इण्डिया काफी हाऊस" हैं।श्याम जी का इधर आना ,आज इसी सन्दर्भ में हुआ था।
"गुड मार्निंग स्सर !"- वर्मा जी अचानक खड़े हो गये। स्सर आप हैं श्याम ,श्याम नारायण जी। बड़ी अच्छी कहानियाँ लिखते हैं, स्सर !"-वर्मा जी कार्यालय के बड़े साहब का परिचय कराने लगे। बड़े साहब किसी कार्यवश अनुभाग में आए हुए थे कि वर्मा जी अचानक खड़े हो गये । परिचय का क्रम जारी रखते हुए आगे कहा -" और आप हैं हमारे बड़े साहब अस्थाना स्सर ! ,बड़े दयालु हैं ,हिंदी के अच्छे ज्ञाता हैं । स्सर को कहानियाँ आदि पढ़ने की अति रुचि है."- वर्मा जी ने बड़े साहब का ’स्तुतिगान’ जारी रखते कहा-"साब ने आफ़िस-पत्रिका में पिछली बार क्या संदेश लिखा था ...वाह ! कार्यालय के सभी कर्मचारी ,साहब के हिन्दी लेखन का लोहा मान गये थे और कार्पोरेट आफ़िस वाले ! कार्पोरेट आफ़िस वाले तो कार्यालय प्रगति के साहब के लिखे हुए आंकड़े की तो आज भी तारीफ़ करते हैं"
वर्मा जी ने ’स्तुति-गान’ चालू रखा था.स्तुति-गान का अपना महत्व है विशेषत: सरकारी कार्यालयों में। यह गान वैदिक काल से चला आ रहा है । सतयुग ,त्रेता में यही स्तुति कर ऋषि मुनियों ने देवताओं से ’वरदान’ प्राप्त करते थे आजकल सरकारी कर्मचारी/अधिकारी प्रमोशन का इनाम और ’वेतनमान’ प्राप्त करते हैं। वह नर मूढ़ व अज्ञानी है जो "स्तुति" को नवनीत लेपन (मक्खनबाजी) या "चमचागिरी" कहता है।
अपनी ’स्तुति’ सुन कर अस्थाना जी ,किसी नवोदित हिंदी कवि की भाँति अति-विनम्र हो गए।वर्मा ने देखा निशाना सही लग रहा है। अत: अपना गान जारी रखते हुए कहा-"और भाई श्याम जी !जानते हैं? बड़े साहब का हिंदी प्रेम इतना है कि इस बार "हिंदी-पखवारा" में हिंदी उत्थान के लिए कई कार्यक्रम आयोजित करवाए जैसे...गोष्ठी ,..सेमिनार...अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता..आशु हिंदी टंकण..कविता वाचन ..निबंध लेखन...। इस बार का "निबंध लेखन का प्रथम पुरस्कार तो भाभी जी (मैडम अस्थाना) को गया। भई वाह ! क्या निबंध लिखती हैं ...वैसा तो हम लोग भी नहीं लिख पाते....."
"अरे वर्मा ! तू तो मुझे पानी-पानी कर रहा है ..वरना मै तो क्या ..हिंदी का एक तुच्छ सेवक हूँ.."- अस्थाना जी ने बीच में ही बात काटना उचित समझा और आगन्तुक की तरह मुखातिब होकर बोले -" हाँ भई ,क्या नाम बताया?? हाँ श्याम जी ,लिखते-पढ़ते तो हम भी हैं ...मगर कभी आप को छपते हुए नहीं देखा "-बड़े साहब ने हिकारत भरी नज़र से श्याम की तरफ़ देखते हुए कहा।
"स्सर !’-श्याम ने पूछा-" सर ,आप कौन सी पत्रिका पढ़ते हैं"
"अरे भई ,एक हो तो बतायें ,कई पढ़ते हैं.-’आज़ाद-लोक...,अंगड़ाई..दफ़ा ३०२ ...तिलस्मी कहानियाँ ...रोमान्चक किस्से...वगैरह वगैरह "-बड़े साहब ने आत्म-श्लाघा शैली में कहा।
"खेद है सर ,हम वहाँ नही छपते ,हम छपते हैं धर्मयुग में ..हिन्दुस्तान में,,.नवनीत में ,,वागर्थ में,,सरिता में ..सारिका मे...’-श्याम ने एक दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए अपनी अन्तर्व्यथा जताई - "सर जहाँ हम छपते हैं वह आप पढ़ते नहीं"
" ओ! या या ! इसी लिए तो । जो हम पढ़ते हैं वहाँ आप छपते नही।-बड़े साहब ने उससे भी एक बड़ा उच्छवास छोड़ते हुए अपनी अन्तर्व्यथा जताई- " यार वह पत्रिका क्या ! जो रात में मजा न दे" -कहते हुए बड़े साहब उठ कर चल दिए
अस्तु
-आनन्द.पाठक

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

एक व्यंग्य : तितलियाँ ज़िंदा हैं ........

एक व्यंग्य : तितलियाँ ज़िन्दा हैं..
जब से अस्थाना साहब इस विभाग में स्थानान्तरित होकर आये हैं काफी उदास रहते हैं।उदास रहने का कोई प्रत्यक्ष कारण तो नहीं था।फिर भी उन्हें अन्दर ही अन्दर कुछ न कुछ कमी महसूस होती थी।कहने को विभाग ने तो प्रोन्नति देकर यहाँ भेजा था,तथापि वह सन्तुष्ट नहीं थे।एकान्त में प्राय: इस विभाग को कोसते रहते थे....स्साला उद्दान विभाग भी कोई विभाग है ! उगाते रहो फूल-पौधे और बेचते रहो माला-फूल।
यहाँ आने से पूर्व ,वह राज्य के वन-विभाग में अधिकारी थे। उनके कार्य-क्षेत्र में साखू-सागौन के पाँच-पाँच जंगल थे। एक एकड़ में फैला बडा़-सा बंगला,एक कोने में गोशाला ,दो-तीन दुधारू गायें,नौकर-चाकर ,आम-जामुन के पेड़...आवश्यकता से अधिक था।बाकी ज़मीन पर खेती-बाडी़ कराते थी ,कुछ अनाज पैदा हो जाता था सो अलग से ।घरेलु कार्य हेतु,दो-तीन नौकर-चाकर अलग से लगा रखे थे .....कोई झाडू-बहारू करता,कोई खाना पकाता। ड्राईवर बच्चे को स्कूल छोड़ आता । फिर तो मेम साहब के पास समय ही समय था। कभी सिनेमा,कभी पार्टी ,कभी क्लब ,कभी किटी ,कभी पिकनिक,कभी शापिंग । क्या चीज़ नही थी अस्थाना साहब के पास। जिन वन-अधिकारी के कार्य-क्षेत्र में पाँच-पाँच जंगल हो समझिये उसके पाँचों उंगलिया घी में....
इस सुख-सुविधा के स्थायित्व के लिए ,अस्थाना साहब को कुछ विशेष परिश्रम करना पड़ता था ...बड़े साहब के लिए यदा-कदा लिफ़ाफ़ा बन्द पत्रम-पुष्पम. हें !हें! बच्चों के लिए है । होली-दिवाली के लिए विशेष डालियाँ काफी थी । क्षेत्र के एम०एल०ए० एम०पीके लिए अलग व्यवस्था। कभी सागौन की लकड़ी ,कभी साखू के बोटे।चुनाव काल में विशेष उपहार योजना।पार्टी फण्ड में चन्दा अलग। अस्थाना जी ने इस सेवा में कभी कमी न होने दी।बडी़ श्रद्धा भक्ति से कार्यरत थे।यही उनकी कर्मठता थी ,यही उनकी कार्य कुशलता। यही उनकी निष्ठा थी ,यही उनकी क्षमता । सरकारी शब्दावली में उनके दो दो ’गाड-फ़ादर’ थे। टिकने-टिकाने के सभी गुर मालूम थे उन्हें।
कहते हैं शातिर से शातिर खिलाडी़ भी मात खा जाता है। इस क्षेत्र में आप के सहयोगी भी बड़े घाघ होते हैं आप की ठकुरसुहाती भी उन्हें नहीं सुहाती।आप को देखते ही एक कुटिल व्यंग्य मुस्कान छोड़ेंगे। करीबी हुए तो कह भी देंगे-" अरे यार अस्थाना ! अब तो बेबी भी बडी हो गई शादी भी यहीं से करेगा क्या?" अर्थ स्पष्ट है -यार खिड़की वाली सीट छोड़ तो हम भी एकाध साल के लिए बैठ लें।परन्तु अस्थाना साहब ही कौन सी कच्ची गोली खेले हुए हैं।वह भी उसी शैली में प्रतिवाचन कर देते हैं -"यार सक्सेना!हम तो कब से बोरिया-बिस्तर बाँधे हुए है,परन्तु सरकार छोड़े तब न,बहुत झंझट है यहाँ,हमेशा टेन्शन ही टेन्शन है। कभी अमुक मंत्री आ रहे हैं...कभी अमुक मंत्री जा रहे हैं...।’
सक्सेना जी इस वाचन का निहित अर्थ समझते हैं।
सक्सेना ,अस्थाना जी का पद-स्थायित्व रहस्य-मन्त्र बड़े ही मनोयोग से सीखने लगा और बड़े साहब की सेवा में तल्लीन हो गया।यदा-कदा अस्थाना जी से बड़ा लिफ़ाफ़ा पर्व-उत्सव पर प्रस्तुत करने लगा। एम०पी० ,एम०एल०ए० के स्वागत सत्कार में कोई कमी नहीं होने देता था क्योकि चन्दा दान की कोई सीमा नहीं होती है। सेवा करवाने वाले को इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सेवा कौन कर रहा है। बड़ी सेवा ,बड़ा पद।अच्छी सेवा , अच्छा पद।अन्तत: सक्सेना ने बाज़ी मार ही ली और एक दिन अस्थाना साहब की खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। सेवा करवाने वालों ने अपने सिद्धान्त में ईमानदारी बरती-जैसी सेवा-वैसा पद।
अस्थाना जी को उद्यान विभाग में ठेल दिया गया।जब से आए हैं,दुखी रहते हैं।उनकी व्यथा ,उनका दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट झलकता है। सोचते हैं ,कहाँ आकर फँस गए। कहाँ वहाँ नरक की राजसी ठाठ ,कहाँ यहाँ सरग की दासता!
अस्थाना जी को सक्सेना से ज्यादा अपने आकाओं पर खीझ थी । अपने साहब से नाराज़गी थी-..’कॄतघ्न ...खाली सेवा देखता है,भक्ति नहीं। अरे ! कुत्ते होते हैं कुत्ते सब के सब.....दो रोटी जिधर ज्यादा देखी...लगे लार टपकाने उधर...अरे ! पैसे की आवश्यकता थी तो हमको इशारा कर दिया होता ....एकाध लाख के लिए मर नही गये थे ...हुँ ...समझता है कि हार्टिकल्चर विभाग से ही रिटायर हो जाएंगे....अरे ! बदलने दीजिए यह सरकार ....फ़िर देखिए "सूट्केस" की ताकत..’सूटकेस" की ताकत अभी जानते नहीं हैं....."अस्थाना जी ने दुर्वासा शैली में मन ही मन श्राप दिया।
न सरकार बदली,न अस्थाना बदले
विभाग रास नहीं आ रहा था ,करते रहो शहर भर के पार्कों की रखवाली। इन पार्कों में जितने माली न होंगे उस से ज्यादा तो मेरे वन-विभाग वाले बंगले पर खटते थे।हमने क्या उद्यान विभाग की सेवा के लिए इस धरा पर शरीर धारण किया है? अरे! हम तो वन-संरक्षण के लिए अवतरित हुए हैं। हमे देश की सेवा करनी है। वन रहेगा तो देश रहेगा ,हम रहेंगे। जितना बड़ा वन-क्षेत्र ,उतनी बड़ी देश सेवा।
अस्थाना जी अपने वेतन को तीस दिन की मज़दूरी मानते थे,अफ़सरी नहीं।मीठे पानी की बड़ी मछली थे ,उद्यान विभाग में छटपटा रहे थे । कहाँ वहाँ गहरे पानी का तैरना और कहाँ यहाँ कीचड़ में लोटना।
अब तो उतनी भी नहीं मिलती मयखाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में
अभी बिटिया की शादी करनी है,फ़्लैट का किश्त देना है,बेटे को बाहर भेजना है,छोटे साले की फ़ैक्टरी लगवानी है,अभी.....। कुछ तो जुगाड़ करना पड़ेगा।
इसी जुगाड़ करने के सन्दर्भ में प्रथम कार्य स्वरुप शहर भर के मालियों का स्थानान्तरण आदेश निर्गत कर दिया.....स्साले कई कई साल से एक ही स्थान पर बैठे हैं...गन्ध मचा रखी है..।
अल्प वेतन भोगी कर्मचारियों पर मानो कहर ही वरपा हो गया । भाग-दौड़ शुरू हो गई,सोर्स....हुँ...सोर्स लगाते हैं सब।अरे! मेरी पैरवी कौन सुन रहा है कि मैं यहाँ सड़ रहा हूँ।
अस्थाना जी को अपना आदेश न बदलना था,न बदले।
अन्तत: समाधान निकला।साहब और मालियों के मध्य एक अलिखित मूक सहमति बनी। अब कोई दूध लाता है तो कोई दही।कोई सब्ज़ी लाता है,कोई घी। कोई मुर्गा,कोई मछली।अन्तत: उक्त आदेश निरस्त हुआ और साहब का कुछ-कुछ जुगाड़ हो गया।
अगले आदेश के क्रम में रात्रि आठ बजे के बाद जन साधारण का सरकारी उद्यानों में प्रवेश वर्जित कर दिया।रात के अँधेरे में झाड़ी के पीछे रास-लीला रचाते हैं। चौकिदारों ने स्थानीय मजनुओं द्वारा देर रात गये पार्क के "एडल्ट" उपभोग के लिए अतिरिक्त सुविधा शुल्क बाँध दिया,जिसका वह कुछ अंश साहब की मासिक सेवा हेतु तथा शेष अंश दूध-दही,साग-सब्ज़ी के लिए सुरक्षित रख लेते थे।
कहते हैं अस्थाना जी लहरें गिन-गिन कर भी व्यवस्था करने वाले प्राणी थे।एक दिन प्रात: उद्यान भ्रमण व निरीक्षण क्रम में अस्थाना जी ने फूलों पर ओस की कुछ बूँदें देखी,बड़ी मनोहारी लग रही थी जैसे नायिका के कपोल पर दो श्वेत-श्रम-बिन्दु उभर आएं हो। हल्की -हल्की हवा बह रही थी । अहा ! क्या मनोरम दॄश्य है ! क्या शबनम के मोती है!अस्थाना साहब जैसे व्यक्ति में भी सौन्दर्य बोध का संचरण होने लगा। अत:गुनगुनाते हुए उद्यान के दूसरे छोर पर निकल गये।
वापसी क्रम में देखा ,ओस की बूँदे गायब हो गई।माथा ठनका ।अभी-अभी तो यहीं थी ,कहाँ गायब हो गईं?चिन्ताग्रस्त हो गये। माली ठीक से रखवाली नहीं करता ।काम चोर है।
"माली"- साहब ने गुस्से से पुकारा-"उद्यान की रखवाली करता है कि सोता रहता है?"
"नहीं साहब ! ठीक से ड्यूटी करता हूँ’
"तो फूलों से ओस की बूँद ,किसने चुराये हैं। बोलो ,किसने चुराये हैं"
"मैने तो नही....मैने तो नहीं"-मारे डर से ,माली के मुँह से एक फ़िल्मी गाने का अन्तरा निकल गया
"चुप ! गाना गाता है"पता लगा कर मुझे सूचित करो"-आदेश निर्गत कर के अस्थाना साहब वापस आ गये
माली मन ही मन दुखी।कैसा खब्ती साहब है!न अपने चैन से रहता है ,न हमे चैन से रहने देता है।कल कहेगा-ये पत्ते कैसे गिरे?यह घास कैसे उगी?और कैसे घुसे.....धत ...??मन में एक प्रत्यक्ष भय जगा ।कहीं इसी बात पर तबादला न कर दे।साग-सब्ज़ी कितने दिन तक मदद करेगी??
इसी अप्रत्यक्ष भयवश,चौकिदार ने दूसरे दिन प्रात: हाथ में डंडा लिए जाँच कार्य में लग गया।कहीं चोरो से मुठभेड़ हो गई तो? वन विभाग में होता तो रायफ़ल भी रख लेता।पता लगाना है कौन चुराता है साहब के शबनम के मोती?कौन घुस आता है यहाँ मेरे रहते?जाँच क्रम में देखा कि कुछ रंग-विरंगी तितलियां फूलों पर बैठ जाड़े की हल्की-हल्की धूप का आनन्द ले रही थीं।बड़ी प्यारी लग रही थी कि अकस्मात.....
"मिल गया ! मिल गया ! अकस्मात माली चीख पड़ा आर्किमिडीज़ की तरह----" ससुरी यही सब हैं जो कल हमका डटवा दिया...बताता हूँ अभी...."
दूसरे दिन माली ने साहब के सामने अपना मौखिक जाँच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया-"....स्साब ! वह कुछ तितलियां है जो आप का मोती चुरा ले जाती हैं"
"उन्हे पेश किया जाय ,ज़िन्दा या मुर्दा"-पॄथ्वीराज शैली में आदेश दिया। आदेश देने के क्रम में अस्थाना साहब भूल गये कि वह मुगले-आज़म के अक़बर नहीं अपितु सरकारी विभाग के एक लोक सेवक हैं।
माली बड़ी निष्ठा व तन्मयता से साहब के आदेश पालन में लग गया।वह तितलियों को ज़िन्दा तो क्या पकड़ पाता ,अत: मुर्दा ही पकड़ना शुरू कर दिया।कुछ दिनों के पश्चात ,मॄत तितलियों को एक फ़ोटो-फ़्रेम में जड़ कर तथा बड़े ही सलीके से सजा कर साहब की सेवा में प्रस्तुत किया।
" इन्हे दीवार में चुन, आई मीन ,दीवार पे टांग दिया जाय"-जैसे अभियुक्तों को सजा-ए-मौत सुना रहे हों
बात आई-गई हो गई।साग-सब्ज़ी आती रही,दूध दही आता रहा।परन्तु फ़्रेम में जड़ित तितलियां महीनों दीवार पे टंगी रहीं।गर्व है इन तितलियों को।मर कर भी उतनी ही सुन्दर व सजीव लग रही है जितना ज़िन्दा रह कर। अगर नहीं है अब तो,उनकी अदाएं,उनका इतराना ,उनका इठलाना., उनकी चंचलता ,उनकी चपलता...। मर कर भी ड्राईंग रूम की शोभा बनी हुई हैं।
उस दिन ,अस्थाना साहब ने अपने छोटे बच्चे के जन्म दिन पर एक पार्टी का आयोजन किया था। उसमें अपने विभाग के बड़े साहब शर्मा जी को भी आमन्त्रित किया था।सोचते हैं.....अरे ! अब यह भी कोई पार्टी है !मात्र रस्म अदायगी रह गई अब तो।पार्टी तो वहाँ करते थे हम वन-विभाग में।लाखों खर्च हो जाते थे ...कौन नही आता था ...डी०एम० ,एस०पी०,एम०एल०ए०, एम०पी०...क्या रौनक हुआ करती थी.... शराब?? शराब तो पानी की तरह बहता था....एक से बढ़ कर एक ...व्हिस्की ..वोडका..रम...जिन..डिप्लोमेट..बैग पाइपर...डिम्पल..।एक बार तो डी०एम० साहब ने मजाक में कह भी दिया था -" अस्थाना ! ऐसा बर्थ-डे पार्टी हर महीने मनाया कर।
मगर अब ! अब कहाँ वैसे दिन!अब तो इस खूसट शर्मा को ही बुला कर सन्तोष करना पड़ रहा है।शर्मा जी ने आते ही आते उचारा -" अरे अस्थाना ! ड्राईंग रूम तो बड़ा सुन्दर सजाया है"
"नो स्सर,यस स्सर,आप की कृपा दॄष्टि है ,स्सर !"-अस्थाना जी ने कुछ सहमते ,कुछ सकुचाते कुछ लडखड़ाते नवनीत लेपन शैली में कहा। अन्दर ही अन्दर भयग्रस्त भी हो गये -कहीं यह शर्मा का बच्चा नज़र तो नहीं लगा रहा।
"और यह तितलियों का सेट? कहाँ से मँगवाया है?-शर्मा जी ने जिग्यासा प्रगट की
"स्सर ! अपने पार्क-पन्नालाल पार्क की है। एक माली दे गया था"-अस्थाना जी ने चहकते हुए कहा
’अपने पार्क की?-शर्मा जी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा कि अचानक जोर-जोर से चीखने लगे-" अस्थाना ! तुम्हे मालूम है?इन तितलियों को मार कर बहुत बड़ी गलती की,अपराध किया है।प्रलुप्त जाति की दुर्लभ तितलियां थी और तुम इन्हे अपने ड्राईंग रूम की शोभा बनाए हुए हो?ये संरक्षित जाति की थीं,इन्हे मारना ज़ुर्म है।तुम्हे सजा भी हो सकती है,विभागीय जाँच भी । तुम निलम्बित भी हो सकते हो......मैं विभाग कों लिखूँगा.."-शर्मा जी ने लगभग डांटते हुए,धमकी देते हुए कहा।
लगता है इस शर्मा के बच्चे ने समस्त जीवन नौकरी नहीं ,बल्कि तितलियां निहारने में गुज़ार दी और बाल सफ़ेद हो गए।
अस्थाना जी को काटो तो खून नही।कहाँ से मंगल गॄह में "शनीचर" आ गया।चिन्ता्ग्रस्त हो गए।अब बर्थ-डे पार्टी क्या होनी थी.....
अगले सप्ताह,अस्थाना जी ने वैसी ही मॄत तितलियों का एक शो-केस और बनवाया और शर्मा जी को उपहार स्वरूप दे दिया। सौंपते हुए कहा-"स्सर यह आप के बैठक कक्ष के लिए है.मृत तितलियाँ है स्सर !आप के शयन-कक्ष के लिए "ज़िन्दा-तितलियाँ" आप के जुहू के हिल-व्यू वाले बंगले पर पहुँचवा दिया है"आस्थाना जी ने लगभग
फ़ुस्फ़ुसाते हुए कान में कहा
"ज़िन्दा तितलियाँ?" -इस अन्तिम वाक्य को सुन कर शर्मा जी अति गदगद हो गये।सफेद मूँछे काली हो गईं। चेहरे पर चमक आ गई।
उस शाम शर्मा जी अपने हिल-व्यू वाले बंगले के शयन कक्ष में शराब और कबाब के साथ "ज़िन्दा तितलियों" के शबाब में रात भर रसमय व सराबोर होते रहे।
दूसरे ....दिन
शर्मा जी ने विभागीय जाँच के बदले प्रोन्नति हेतु अस्थाना जी के पक्ष में संस्तुति कर दी।
अस्तु
--आनन्द.पाठक

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

एक व्यंग्य: अनावरण एक(गांधी) मूर्ति का...



नेता जी ने अपनी गांधी-टोपी सीधी की।रह रह कर टेढी़ हो जाया करती है। विशेषत: जब वह सत्ता सुख से वंचित रहते हैं।धकियाये जाने के बाद टेढी़ ,मैली-कुचैली हो जाती है।समय-समय पर सीधी रखना एक बाध्यता हो जाती है,अन्यथा विरोधी दल ’टोपी-कोण" पर ही हंगामा शुरू कर सकते हैं। विपक्ष के पास वैसे भी मौलिक मुद्दों की कमी बनी रहती है।व्यर्थ में प्रचार करना शुरू कर देंगे-’देखा!,कहते थी न ,नेता जी की टोपी टेढ़ी न हो जाए तो कहना’।इसी अप्रत्यक्ष भय से आक्रान्त ,नेता जी ने अपनी टोपी सीधी की तथा मनोगत गांधी जी को कोसा-’ अपने तो पहनते नहीं थे हमें पहना गये।पहनते तो मालूम होता कि आज की राजनीति में टोपी सीधी रखना कितना दुष्कर व कष्ट साध्य है। करते रहो आजीवन सीधी।अरे! जो पहनते नहीं वो तो ’कैबिनेट ’ में घुसे हैं और हम हैं कि सीधी करते-करते सड़क पर आ गए।’
यही दर्द ,यही टीस लिए मंच पर बैठे हुए नेता जी भाषण हेतु उठे। माइक के सामने आए।ठक-ठक कर टेस्ट किया ।आवाज़ बरोबर निकलेगी तो ? धोखा तो नही देगी? आश्वस्त हुए।तत्पश्चात उपस्थित जन समुदाय का अवलोकन किया,किसी अनुभवी बूचड़ की तरह-’काश ! यह समस्त भीड़ मेरी बूचड़्खाने में आ जाती और ’वोट’ में बदल जाती! इसी कल्पना मात्र से मन आत्मविभोर हो गया ,नयनों में एक विशेष चमक उभर आई। परन्तु अविलम्ब नेता जी ने गम्भीरता का आवरण ओढ़ लिया कि कहीं इस मनोगत हर्ष को लोग ’टुच्चापन’ न समझ लें।लोकतन्त्र है,समझ सकते हैं। फिर एक दॄष्टिपात उस मूर्ति पर किया जिसका उन्होने अभी-अभी अनावरण किया था और फोटो खिंचवाया था।ऐसे अवसरों की छवि काफी मान्यता रखती है ,सनद रहती है ,वक्त ज़रूरत काम आती है।चुनाव टिकट वितरण,छीना-झपटी में संभवत: दिखाना पड़ जाए -कितने फ़ीते काटे,कितने वोट काटे?
फिर मंच पर बिछी ज़ाज़िम को देखा। वर्षों से नेताओं का भार ढोते-ढोते जीर्ण-शीर्ण व गन्दी हो चली है।इसको बदलने की आवश्यकता को कोई महसूस नहीं करता । वो लोग भी नहीं ,जिन्होने इसे जीर्ण-शीर्ण-विदीर्ण बनाया है। शून्य आँखों से ऊपर शामियाने को देखा।कहाँ-कहाँ से क्षेत्रीय टुकड़े लाकर जोड़ दिया है जुम्मन मियां ने -किसी मिली-जुली साझा सरकार की तरह।कितने छिद्र हो गए हैं यत्र-तत्र।साझा सरकार यानी शामियाने को यह भ्रम है कि टंगा है जनता के सर पर रक्षा के लिए।यदि लोकतन्त्र के अन्य स्तंभ न होते न्यायपालिका के ,कार्यपालिका के या हमारे जैसे ज़मीन में धँसे कर्मठ कार्यकर्ताओं के,तो क्या यह शामियाना टंगा रह सकता था?इसी मनन-चिन्तन में डूबे नेताजी ने अपना दायाँ पैर आगे बढा़ ,बायाँ पैर पीछे खींच ,हाथ पीछे बाँध,गला खँखारा फिर प्रस्फुटित हुए...
" देवियों और सज्जनों !(मनोगत इस सभा के बाद गारंटी नहीं)
-आज बड़े ही हर्ष का विषय है कि आप से मिल-बैठ, आमने-सामने, दो-चार बात करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।आप लोगो ने यहाँ पधारने का जो कष्ट किया है उससे गांधी जी की मूर्ति ,मेरा अभिप्राय है कि यह समारोह कृतज्ञ हुआ ।हमने आप की समस्यायें सुनी ,आप हमारी सुने।यही सौहाद्र है ,यही परस्पर प्रेम है ,यही भाई चारा है।"
नेता जी एक पल चुप होते हैं।चिन्तन की मुद्रा अपनाते है। आँखे बन्द करते है। अभी प्रथम गियर में चल रहे हैं,लोहा गरमा रहा है ।
".....अभी हमने जिन महापुरुष की मूर्ति का अनावरण किया है,संभवत: उनसे आप सभी लोग परिचित होंगे।जो पुरानी पीढ़ी के है उन्होने गांधी जी का नाम अवश्य सुना होगा। जो नई पीढी़ के हैं उनकी सुविधा हेतु नाम नीचे लिखवा दिया है जिससे हमारे नौजवान भाईयों को मूर्ति पहचानने में कोई असुविधा न हो।इधर हमारी युवा-पीढी़ में एक नई प्रतिभा पनप रही है -मूर्ति-भंजन विधा की,कोलतार लेपन कला की। इसमे उनका दोष नहीं है। दोष है तो हमारी विरोधी पार्टी का। नाम नहीं लूंगा । हमारी युवा-पीढी को भटका रही है ,गुमराह कर रही है। उसमे एक दिशा-बोध की कमी पैदा कर रही है।इस कोलतार-लेपन कला में,विदेशी विशेषत: पड़ोसी देश की छिन्न-भिन्नात्मक शक्तियों का हाथ है इसीलिए मूर्ति के नीचे नाम लिखवा दिया है कि युवा पीढ़ी आगे आए ,पढ़े व गांधी जी के नाम से परिचित हो । कहीं ऐसा न हो कि कोलतार-लेपन या मूर्ति-भन्जनोपरान्त आप सुबह-सुबह ग्लानी से भर उठें -हाय! हमने तो जाना ही नहीं कि यह किस महान आत्मा की मूर्ति थी! ... तो भाईयो और बहनो !मै इस तहसील के नुक्कड़ से ,देश की समस्त युवा पीढी़ का आह्वान करता हूँ कि अब वक्त आ गया है गांधी जी की मूर्ति पहचानने का ,नाम पढने का ......"
तालियां बजने लगी। नारे लगने लगे -नेता भईया ज़िन्दाबाद ! ज़िन्दाबाद!..लोहा गरम होने लगा ,गाड़ी गियर पकड़ने लगी।
" ....आप को ज्ञात है ,इस सभा में अन्य दलों के कुछ कार्यकर्ता भाई लोग भी सम्मिलित हैं। मैं नाम लेना उचित नहीं समझता ....परन्तु यह सर्व विदित है ,,,’छमिया रेप-काण्ड में कौन-कौन लोग शामिल थे ? नथुआ-हत्या काण्ड किसने कराया? अरे! वही जो दलित था,शोषित था ।अब बचने के लिए पार्टी का सहारा लेते हैं ।...हमने स्पष्ट कर दिया है ,नहीं भाई ,नहीं । पार्टी ऐसे छिछोरे ,छोटी-मोटी हरकतों के लिए नहीं होती ---देश में इससे भी बड़े-बड़े काम है जिसमे पार्टी को काम करना है मसलन चारा घोटाला.चीनी घोटाला.नरेगा घोटाला .हवाला..नारी पर अत्याचार..गाँव की बहू-बेटियों पर अत्याचार
,हमारे घर-परिवार के सदस्यों, भाई-भतीजों पर अत्याचार। हमें बर्दाश्त नहीं करना है । हमें इस तहसील के नोनी माटी की कसम ,गांधी जी के डण्डे की सौगन्ध ,इन फासिस्टवादी शक्तियों को बेनकाब करना है....."
"...बोलिए भारतमाता की जय!.." -भीड़ ने जयघोष किया ।तालियां बजने लगी। भीड़ में जोश क संचार होने लगा।आयोजको में उत्साह-वर्धन होने लगा,लोहा गर्म होने लगा,गाड़ी गियर पकड़ने लगी। नेता जी एक क्षण चुप हो ,तालियों की संख्या गिनने लगे।
".....हाँ ,तो मै क्या कह रहा था? हाँ ,तो फासिस्टवादी शक्तियों को बेनकाब करना है । मैं अपने किसान भाईयो को, श्रमिक भाईयों को यह बता दूँ इन शक्तियों क मूल इस गाँव में नहीं ,इस तहसील में नहीं,हमारे-आप के अन्दर नहीं ,इनका मूल है दिल्ली में ,हमें दिल्ली जाना होगा मूलोच्छेदन करने।आशा है आगामी आम चुनाव में हमारा आप अवश्य ख्याल रखेंगे....."
भीड़ ने पुन: जयघोष किया-’नेता भईया -ज़िन्दाबाद,ज़िन्दाबाद।जबतक सूरज चाँद रहेगा-नेता भईया नाम रहेगा। भाई साहब संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं...देश क नेता कैसा हो.....? जैसे नपुंसक नारों से शामियाना गूँज उठा। नेता चाहे जैसा हो,पार्टी चाहे जिसकी हो,आयोजन चाहे जो हो-ऐसे ही शक्ति-शून्य नारे लगते हैं। तालियां बजती है...कोलाहल बढ़ता है..लोकतन्त्र आगे बढता है।
"....भाईयों शान्त रहें,शान्त रहें!अपना अपना आसन ग्रहण कर लीजिए । अरे हरहुआ ! बैठता काहे नहीं रे ? हाँ तो अब मूल विषय पर आता हूँ इन महापुरुष के संबंध में जिनका अभी-अभी हमलोगो ने अनावरण किया है-इसका समस्त श्रेय गजाधर बाबू को जाता है जो इस क्षेत्र के एक सक्रिय व कर्मठ कार्यकर्ता समाजसेवी हैं ,सौभाग्यवश आज हमारे बीच उपस्थित भी हैं।मेरे बाद आप इनके भी विचार सुनेगे और लाभान्वित होंगे।इस क्षेत्र की जनता के लिए गांधी जी की एक मूर्ति की आवश्यकता बहुत वर्षों से महसूस की जा रही थी जो गजाधर बाबू के अनवरत प्रयास व सतत संघर्ष से चालीस साल बाद संभव हुआ। इस पुण्य कार्य हेतु गजाधर बाबू धन्यवाद के पात्र ही नहीं,महापात्र हैं।
"...अब इस क्षेत्र के नौजवानों भाईयो को,श्रमिको को ,किसानो को,बच्चो को ,महिलाओं को,सुहागिनों को,विधवाओं को,लूलों को,लंगडो़ को २-अक्तूबर के दिन ट्रैक्टरों मे लद-लद कर शहर नहीं जाना पड़ेगा ।यहीं पर श्रद्धा सुमन चढ़ा देंगे।अपना चर्खा यहीं धो-पोछ कर लायेंगे और गांधी जी के श्री चरणों में बैठ कर रामधुन गायेंगे,सूता कातेंगे और फोटू खिंचवा लेंगे। अन्यथा दो घन्टे के काम के लिए दिन भर लग जाता था।आप के सालो साल का आवन-जावन का कष्ट नहीं देखा जा सका गजाधर बाबू से ,सो एक अदद मूर्ति यहीं स्थापित करवा दी।"
पुन: जयघोष हुआ -गजाधर बाबू ज़िन्दाबाद..ज़िन्दाबाद...जब तक सूरज चाँद रहेगा....-एक नारा उछला तो गजाधर बाबू के खादी कुर्ते को इत्र की तरह भिंगो गया। मंच गमक गया ।गजाधर बाबू हर्षित हो गए,मन प्रफुल्लित हो गया। परन्तु तुरन्त गंभीरता का का दुशाला ओढ़ ,हाथ जोड़,भाव-विभोर हो,श्रद्धावश सर झुका लिया।नारे के प्रति श्रद्धा? ज़िन्दाबाद के प्रति समर्पण? या उपस्थित जनसमुदाय के प्रति प्रेम विह्वलता?
"....और अन्त में ,आप लोगो का ज्यादा समय नहीं लूंगा। और भी हमारे कई भाई है जो हमारे बीच मंच पर उपस्थित है।आप उनके भी विचार सुनेंगे। इच्छा होते हुए भी आप लोगो के बीच ज्यादा समय नहीं दे पा रहा हूँ।आज सुबह जब डी०एम० साहब के यहाँ नाश्ता कर रहा था तो पी०एम० आफ़िस से काल मिला-भाई साहब ! तुरन्त दिल्ली पहुँचो । क्या करे! ससुरा वक्त ही नहीं मिलता, हम अपने गरीब भाईयों को देखें कि लख्ननऊ ,दिल्ली देंखे? कई बार कहा कि भाई साहब इतना लखनऊ दिल्ली न बुलाया करो ,हमें अपने ग्रामीण भाईयों को देखना है ।पहले (चुनाव के पहले?) हम उनके है बाद (चुनाव के बाद?) में हम आप के है ,दिल्ली के हैं।...तो भाईयों मैं महात्मा जी को शत शत प्रणाम करता हूँ ,उनके दण्ड को प्रणाम करता हूँ जिससे उन्होने अंग्रेजों को मार भगाया । आज विघटनकारी शक्तियाँ फ़िर सर उठा रहीं हैं---क्या कश्मीर क्या असम...क्या तमिलनाडु क्या झारखण्ड। क्या उत्तराखण्ड क्या सामनेवाले गाँव का दखिन टोला।अब डण्डा पकड़ कर काम नहीं चलने वाला ...अब इसे चलाना पड़ेगा..."
जोरदार तालियां बजने लगी । "भाई जी संघर्ष करो ...’-जैसे नारे लगने लगे।प्रतीत हो रहा था कि किराए की इस भीड़ को इन नारों के अतिरिक्त कुछ ज्ञात नहीं था ।या २-२ रुपए पर आए ये लोग इससे ज्यादा नारा लगाना नहीं चाहते थे आठ आना प्रति नारा,चार आना नारा लगाने का,चार आना हाथ लहराने का। डिस्को स्टाईल के दर अलग।
"... तो भाईयो और बहनो ! अन्त में आप से कहना चाहूँगा......" नेता जी अन्त में,अन्त में करते करते ३ घन्टे बाद अन्तिआए ,और जो सबसे अन्त में कहा था वह यह था -’आगामी चुनाव में मुझे दिल्ली भेजना न भूलें?
०० ००० ०००००
सभा विसर्जित हो गई।भीड़ लौट गई।बगल वाले कनात में मध्याह्न भोज का एक छोटा सा आयोजन था । मुर्ग-मुसल्लम,मांस-मछली,दवा-दारु आदि का समुचित प्रबन्ध था। आयोजकगण सस्वाद खा रहे थे । बोतल पर बोतल शराब ढाली जा रही थी । गांधी जी निरीह व निस्पॄह भाव से गले में माला धारण किए देख रहे थे। पत्थर के थे। मानवीय भावों से ऊपर।पीड़ा-करुणा से ऊपर ,बहुत ऊपर।
गजाधर बाबू ने उत्साह वर्धन किया। मुस्कराते हुए बोले-" बेटा ! जान डाल दी भाषण में।’
नेता जी ने करबद्ध हो,शीश झुका लिया और एक आन्तरिक पीडा़ संजोए दीर्घ सांस छोड़्ते हुए कहा-"दद्दा! सब आप का आशीर्वाद है ,पर स्साले दिल्ली वाले कुछ नहीं सोचते ,मेरे बारे में"
" ज़रूर सोचेंगे बेटा,ज़रूर सोंचेगे एक दिन’-उससे भी बडी़ पीड़ा लिए,गजाधर बाबू ने उससे भी गहरा उच्छवास छोड़ते हुए कहा-" मुझे ही देख ,इसी आशा में मैं बूढा़ हो चला ,दिल्ली को मेरे बारे में सोचना ही पडे़गा...."
ग्यात हुआ दोनो व्यक्ति दिल्ली को एक घंटा तक अपने प्रति सोचवाते रहे।

गांधी जी की मूर्ति-स्थापना से गाँव वालों का भला हुआ कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। परन्तु एक सत्य नि:संदेह व निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि आस-पास गाँव कि जितने नशेड़िए, गंजेड़िए ,भंगेड़िए थे उनका काफी भला हुआ ।अब खोली में छुप कर नशा करने की आवश्यकता नहीं थी ।रात के अंधेरे में गांधी चबूतरा ही काफी था। गांधी जी स्वयं प्रकाश - पुंज थे अत: अधिकारियों ने रोशनी की व्यवस्था करना आवश्यक नहीं समझा। सारे नशेड़िए मिल कर दम लगाते थे । पुलिस उधर नहीं जाती थी। पुलिस को गांधी जी से क्या काम? गांधी चबूतरा अभयक्षेत्र हो गया ।गंजेडियों क भय दूर हो गया,भय से मुक्ति।गांधी जी भी तो यही चाहते थे ।दिन में गांधी जी की मूर्ति के ऊपर सारे कबूतर विष्ठा करते थे और सारे नशेबाज......

मूर्तियां स्थापित हो जाती हैं और सभी लोग अपनी-अपनी सुविधा से इसका उपयोग करते हैं।

अस्तु!

-आनन्द

बुधवार, 23 सितंबर 2009

एक व्यंग्य : रावण नहीं मरता.....

एक व्यंग्य : रावण नहीं मरता.....
सुबह ही सुबह मिश्रा जी आ टपके। हाथ में सद्द: प्रकाशित उनका कोई कहानी संग्रह था।मैं चिन्तित हो गया ,उन्हे देख कर नहीं ,अपितु उनका कहानी संग्रह देख कर।विगत वर्ष भी वह अपना ऐसा ही एक कहानी संग्रह लेकर उपस्थित हुए थे जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे जैसे बहुत से पाठकों ने कहानी पढ़ना ही छोड़ दिया।लगता है हिंदी जगत में कल रात फिर कोई दुर्घटना हो गई। आते ही आते हड़्बड़ाते हुए बोले-
" पाठक ! एक कलम देना"
"क्यों ? लिखते हुए तो पाठक गण से कलम नहीं माँगते हो"
"यार ! मजाक छोड़ो ,जल्दी में हूँ ।मुझे यह संग्रह तुझे भेंट करना है"
"तो भेंट कर दो न ,कलम के बदले भेंट करोगे क्या?"
"यार ,जल्दी करो,मुझे और लोगों को भी यह संग्रह भेंट करना है"
मैं प्रेम में पराजित किसी योद्धा की तरह तर्कहीन हो अपनी कलम सौंप दी
मिश्रा जी ने जल्दी जल्दी कलम खोली,रोशनाई छिड़की,पारम्परिक शैली में लिखा
"स्वर्गीय पाठक को
एक तुच्छ भेंट
-सस्नेह मिश्रा।
"भाई मिश्रा !अभी हम स्वर्गीय नहीं हुए हैं"-मैने संशोधन करना चाहा
"तो क्या हुआ ? हो जाओगे। अग्रिम लिख दिया । सोचा फिर कहाँ मिलोगे"
"लगता है पूरा संग्रह आद्दोपान्त पढ़ अवश्य हो जाऊँगा"
"हें! हें ! प्रतीत होता है तुम्हारा व्यंग्य बोध स्तर ’परसाई’ जी से कम नहीं है"-मिश्रा जी ने मेरी प्रतिभा सराही
"और आप की भी कहानियों का स्तर "अज्ञेय " जी से कम नहीं -मैने बिना पढ़े ही उनकी प्रतिभा सराही।
फ़िर हम दोनों अपने-अपने महापुरुषों को अणाम-प्रणाम कर श्रद्धानत हुए।हिंदी में इसे लेन-देन की पारस्परिक समीक्षा कहते हैं।
"यार पाठक,जरा मैं जल्दी में हूँ....तथापि इन कहानियों के बारे में संक्षेपत: स्पष्ट कर दूँ ....
" मालूम है भाई मिश्रा ! हिंदी का पाठक यूँ भी जल्दी में नहीं रहता ,जल्दी में रहता है लेखक...उसे छ्पास की जल्दी रहती है...संग्रह भेंट करने की जल्दी रहती है....उसे जल्दी रहती है समीक्षा करवाने की...गोष्टी करवाने की ...विमोचन करवाने की...खेमा में घुसने की...।पाठकगण का क्या है! मुफ़्त में मिला तो पढ़ लिया"-मैने स्पष्ट किया
"यार लगे बोर करने।हाँ तो मै कह रहा था कि जो तुम देख रहे हो वह सत्य नहीं,जो सत्य है वह अलक्षित है ..सत्य धर्म है,,सत्य शाश्वत है ...पराड़्मुखता ही जीवन सार है ..वैशिष्ट्य ही व्यक्तित्व है...संग्रह का अपना व्यक्तित्व है..लेखनी का अपना मूल्य (मोल नहीं) है । स्थापित मापदण्ड है...सत्य चिन्तन है...चिन्तन और मनन में तार्किक अन्तर है ..सत्य प्रज्ञा है..अज्ञेय है...रावण मरता नहीं...मरना भी नहीं चाहिए...रावण मर गया तो राम क्योंकर आएंगे...? यदा यदा ही धर्मस्य ...राम का आविर्भाव होना है..... तो रावण को ज़िन्दा रखना होगा ..। राम चेतना हैं....रावण जड़ है...वह जड़ जिसकी जड़ें गहराईयों में दूर दूर तक फैली हैं ,,गाँवों से लेकर शहर तक...लखनऊ से लेकर दिल्ली तक..।ऊपर स्थूल है ...नीचे सूक्ष्म अदॄश्य अगोचर...हमें स्थूल से सूक्ष्म की तरफ जाना है...यही रहस्यवाद है ..छाया पीटने से कुछ नहीं होगा...हमें स्थूल पहचानना होगा...मूलोच्छेदन करना होगा....."
" आप चाय पीयेंगे?’ -मैने मध्य में ही बात काटना श्रेयस्कर समझा
" और आप?"
"मेरे लिए ’पेनजान ही काफी है"
"तो क्या आप भी मेरी तरह ’पेनजान’ पर भरोसा करते है?--उन्होने झट से ’पेनजान’ की एक टिकिया मेरी तरफ़ बढ़ दी और पुन: शुरू हुए
" हाँ ,तो मैं क्या कह रहा था.....?"
"कि आप को अभी कई जगह जाना है।"
" हाँ ,तो हमें सूक्ष्म से स्थूल की तरफ जाना है..."
"जी नहीं,आप को यह संग्रह भेंट करने जाना है"
" चले जाएंगे यार ! जब मुफ़्त में ही देना है तो कौन सी जल्दी है"
" मगर मुझे है"-कह कर मैं अन्दर चला गया।
०००० ०००००० ---
यह कहानी संग्रह क्या था ! उसकी संक्षेपिका जो अभी-अभी स्पष्ट कर गए ,अगम्य थी।नि:शुल्क दे गये थे सो पढ़ना पड़ा। आवरण काफी आकर्षक व मनमोहक था। शीर्षक से अच्छी तो आवरण पर अनावॄत लडकी की वह तस्वीर थी जो ग्लोसी पेपर पर छ्पी थी बिल्कुल रानू के उपन्यास की तरह।प्रकाशक महोदय ने अपनी लेखनी से दो-चार पृष्ट का संक्षिप्त परिचय लिख दिया था जिसका आशय यह था कि हिंदी कहानी में प्रेमचन्द जी का पुनर्जन्म हो चुका है। हिंदी जगत को इस लेखक से काफी आशा है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि ऐसी सुपाठ्य पुस्तके छाप -छाप कर वह हिंदी की सेवा करते रहेंगे।
ऐसे संग्रह की समीक्षा क्या लिखना !पाठकों हेतु ’एनोटमी"(शरीर संबंधित)समीक्षा लिख रहा हूँ।"आवरण" देख शरीर में एक अदॄश्य सी ’अँगड़ाई’ उभरने लगी।प्रकाशक जी द्वारा लिखित संक्षिप्त परिचय पढ़ा तो ’माथा भारी’ हो गया,प्रस्तावना पढ़ी तो पूरे बदन में एक "जकड़न-सी होने लगी,प्रथम कहानी में "जम्भाई" दूसरी कहानी पढ़ हल्का-हल्का ज्वर। तीसरी कहानी पढ़ते-पढ़ते ’जाड़ा’देकर कंपकंपी फिर जूड़ीताप। लगता है ठीक ही लिखा था अन्तिम कहानी पढ़्ते-पढ़ते स्वर्गीय......
मध्यान्तर तक जाते मैं अचेत हो गया ।
भयंकर सपने आने लगे-जी हारर शो की तरह।घटाटोप अन्धकार ....,भयानक सन्नाटा,,.....दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज....खण्डहर में रह-रह कर पंख फड़्फड़ाते सन्नाटा भंग करते हुए परिन्दे....फिर देर तक भयानक शान्ति....घरर चरर कर खुलता हुआ एक दरवाज़ा... नीरवता भंग करते हुए ,,,कि अचानक ...हा!हा! हा! ,-एक भयंकर अट्टहास से डर गया मैं।
" हा ! हा ! हा! पहचान मैं कौन हूँ??’- छाया ने अट्टाहास किया।
"महाराज ! आप को कौन भूल सकता..?मैं भयभीत हो हाथ जोड़ काँपने लगा- ’ महाराज ! पू्रे ’रामायण काल’ में तो क्या ,मैं तो कहता हूँ सम्पूर्ण संस्कॄत वांडःमय में या यों कहें कि पूरे विश्व साहित्य में आप के अतिरिक्त और कौन -सा पात्र है जिसके दस मुख हैं? दशानन है?"
"हूँ, सही पहचाना!"-कहते हुए अपने खड्ग का अग्रभाग मेरे कंधे पे टिका दिया जो इस समय मुझे किसी ए०के० -४७ से कम नहीं लग रहा था।
"मगर महराज ! "-रावण कहने से अप्रत्यक्ष भय था ,कहीं बिगड़ न जाएं।बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे अवसर पर महाराज ,महामहिम,माननीय,महाशय,महोदय,पूजनीय, जैसे नवनीत लेपक सम्बोधन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
" महाराज ! आप कौन वाले है? वाल्मीकि ,तुलसीदास या रामानन्द सागर वाले?"- मैने डरते-डरते पूछा
"अरे मूढ़ ! मुझे ’मोशाय’ बोल ,’मोशाय’"- अपने खडग का अग्रभाग दबाते हुए बोला- " अरे मूढ़ ! मैं सार्वकालिक हूँ ,हर काल में व्याप्त हूँ, हर स्थान में व्याप्त हूँ। त्रेता से लेकर द्वापर तक । रामायण में ’रावण’ बना तो "कॄष्णा’में कंस,। अरे मूर्ख ! अपना चौखटा उठा और देख ,लगता है तू रामानन्द सागर का सीरियल नहीं देखता?"- मैने डरते-डरते ऊपर देखा ।पहचानने का एक समर्थ प्रयास किया ।विस्मित हो गया।
" अरे ’त्रिवेदी जी " आप !"-स्वप्न में कैसे?"- भय कुछ कम हुआ
"हा ! हा ! हा ! खा गया न धोखा ,अरे दुष्ट ! मैं ’त्रिवेदी " नहीं, रावण हूँ रावण।सचमुच का रावण।कल सपने में सीता को देखेगा तो कहेगा-अरे दीपिका जी आप ? आइए आइए कौन सा साबुन दे दूँ। अरे ’रावण’ को देख ’रावणत्व’ को पहचान।
" ठीक है ,ठीक है ।यदि आप सचमुच के रावण हैं तो इधर कलकत्ता में क्या कर रहे हैं ,लंका क्यों नहीं जाते ?" -मैने भी झुंझला कर कहा
"वोई खने छिलाम,लंका में उधर मार-काट मची है सो इधर चला आया, सुना है ’इन्फ़िल्ट्रेशन’ की बड़ी सुविधा है इधर।
"एकटा आस्ते बोलून मोशाय आस्ते बोलून ,राम रथ वाले इधर आ गए तो वापस जाना पड़ेगा"-मैने कहा
"अरे ! छोड़ो । जो एक बार इधर आ जाता है वापस नहीं जाता ’वोट’ में बदल जाता है । वैसे भी मेरा ’वोट’ दस ’वोट’ के बराबर है "-अपने दसो चेहरों की ओर इंगित करते हुए कहा-"चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर सकता,मुझे दस फोटू खिंचवाना है"
"लेकिन आप तो मर गए थे स्सर!"-मैं शुद्ध सचिवालयीय शैली पर उतर आया
" अरे! अज्ञानी !पुच्छ-विषाण-हीन पुरुष ! वह झूठ था,सब झूठ। वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक,राधेश्याम से लेकर रामानन्द सागर तक सबने मुझे मारा। सभी ने यही समझा राम ने मुझे मार डाला। रावण मरता नहीं। ’रावणत्व’ अमर है।आज भी ज़िन्दा है।हर गाँव में,हर शहर में,हर गली में ,हर महानगर में।हर काल में हूँ,हर देश में हूँ,हाईड्रोजन बम्ब में हूँ,परमाणु बम्ब में हूँ, रावण व्यक्ति नहीं ,प्रवॄत्ति है ।हर अपहरण में हूँ,हर युद्ध में हूँ, हर छ्द्मवेश में हूँ,हर हठ में हूँ। मेरे मरने के बाद,क्या अब सीता का अपहरण नहीं होता? क्या सीता जलाई नहीं जाती?सीता का परित्याग नहीं होता? अरे! मैं तो रावण था तथापि सीता का स्पर्श नहीं किया। क्या आज की सीता अछूती है? मैने उन्हें ससम्मान अशोक-वाटिका में रखा ,क्या आज की सीता ’फ़ाईव स्टार’ होटलों में नहीं रखी जाती? राम को मारने के लिए ,रामत्व की आवश्यकता है । तुम्हे रावण नहीं ,’राम’ खोजना चाहिए"
"खोज रहे हैं स्सर! राम भी खोज रहें है। हर चुनाव काल में कुछ लोग ’राम-रथ’ पर आरूढ़ हो राम खोजते हैं देश के इस छोर से उस छोर तक।
’लेकिन तोमारा तुलसी तो बोलता था राम घोट घोट में व्याप्त हैं"
"जी स्सर ! आजकल ’वोट’ वोट ’ में व्याप्त हैं। जब नहीं मिलते है तो उन्हीं के नाम की खड़ाऊँ ले,सदन में घुसते हैं। आज कल जरा व्यस्त है उनका मन्दिर बनाने में ,उन्हीं के गॄह नगर अयोध्या में"
"इस प्रगति से तो मन्दिर तो नही,बहुत से जोगियों वाला मठ बन जाएगा,कलियुग बीत जाएगा"- रावण ने कहा। ज्ञानी था।
"ज़रूर बनेगा" -मैने भी केसरिया स्कार्फ़ बाँधते हुए कहा-"अभी हम लोगों ने भूमि समतल कार्य कर दिया है ,अगला कार्यक्रम किसी अगले चुनाव में या अगले कुम्भ मेला में निर्धारित करेंगे।"
रावण के इस दिव्य ज्ञान से मैं अति प्रभावित हुआ।श्रद्धावश हाथ जोड़ कर कहा -" धन्य हो ज्ञानी श्रेष्ट श्रीमन !आज आप का दर्शन कर कॄतार्थ हो गया।"
" तो और सुन !"- अपना व्याख्यान क्रम जारी रखते हुए रावण ने कहा --"...जो तू देख रहा है वह सत्य नहीं,जो सत्य है वह अलक्षित है ..सत्य धर्म है,,सत्य शाश्वत है ...तू स्थूल है ,मैं सूक्ष्म हूँ...स्थापित मापदण्ड है...सत्य चिन्तन है...जड़ और चेतन में दार्शनिक अन्तर है ..सत्य प्रज्ञा है..अज्ञेय है...
धीरे-धी्रे सपने में आकॄति बदलने लगी। खडग के कुशाग्र की जगह ’लेखनी ’का अग्रभाग चुभने लगा ।तलवार कलम में परिवर्तित होती नज़र आने लगी।मैने कहा -" अरे मिश्रा तू ...!"
" हा ! हा! हा! हो गया न भ्रमित !अरे मूढ़ मै मिश्रा नहीं रावण हूँ ,रावण।अच्छा अब बोल तलवार बड़ी कि कलम?"
" तलवार"-मैने झट से उत्तर दिया
"कैसे?"-आकॄति ने विस्मयकारी विस्फारित नेत्रों से देखा
"आपात काल में तलवार देख कलम चुप हो गई थी।जब तक तलवार की नोंक चुभ रही थी तो ’स्सर स्सर महाशय मोशाय ’ कर रहा था जब कलम की नोंक चुभी तो ’तू’ पर उतर आया"
"पाठक जरा कलम देना "-मिश्रा ने झकझोर कर जगाया।स्वप्न भंग हो गया।निद्रा टूट गई।अंगडा़ई लेते हुए बोला--’"
और जो सुबह दी थी ,वह क्या हुई"
"पाठकों को चुभाते-चुभाते निब टूट गई"
"असंवेदनशील रूढ़मना पाठकों को चुभाओगे तो निब टूटेगी ही। कलम की नोक पर तलवार की नोक लगा दो..."।
मैने कलम और संग्रह दोनो ही लौटा दिए अपनी सुविधा हेतु। यह ले अपनी लकुटि-कमरिया ,बहुत हि नाच नचायो"
-अस्तु
-आनन्द

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

एक व्यंग्य: समर्पित है ....

एक व्यंग्य : समर्पित है....
पाण्डुलिपि तैयार हो गई। काफी श्रम से लिखा था।दिन को दिन नहीं ,रात को रात नहीं समझा।छ्पास की जल्दी थी।हिंदी का लेखक लिखने में जल्दी नहीं करता ,छपने की जल्दी में रहता है। परन्तु जिस का भय था ,वही हुआ।समर्पण का।संग्रह समर्पित नहीं तो रचना क्या !,कन्या रूचि वदन नहीं तो सजना क्या!दिव्यानन्द की अनुभूति तो रचना समर्पण में है।अन्यथा सारा परिश्रम व्यर्थ।समर्पण हमारी संस्कृति है ,हमारी राष्ट्रीय नीति है,अमेरिका के प्रति समर्पण ,बहुदेशीय कम्पनियों के शर्तों के प्रति समर्पण,कांधार आतंकवादियों के शर्तों के प्रति समर्पण,पाश्चात्य मूल्यों के प्रति समर्पण,गिरते मूल्यों के प्रति समर्पण। ’समर्पण’ही किसी रचना का सार-तत्व है।
अन्यथा ,कहानी लेखन में क्या है? कुछ दाएं-बाएं ,कुछ ऊपर-नीचे देख, विदेशी कहानियाँ पढिये और लिख मारिए हिंदी में। क्या पता चलेगा।’डेज़ी’ को ’दासी’ कर दीजिए,’सैमुअल ’ को ’सोम अली’, ’माईकल’ को ’मुकुल’ । चलेगा ,सब चलेगा हिंदी में। वैसे भी हिंदी का पाठक कौन सा किताब पढता है, खरीद कर पढने का तो प्रश्न ही नहीं। अब तो लेखकीय प्रतियां भी निशुल्क नहीं मिलती।पकड़े गये तो क्या।एक टिप्पणी दे देंगे,कह देंगे भाव उनके हैं तो क्या ,भाषा तो अपनी है .परिवेश तो अपना है।सामाजिक परिस्थितियां तो अपनी है,,संस्कॄति तो अपनी है ।कला-पक्ष तो अपना है ।अनुकरण करना भी तो एक कला है।वैसे सामान्य पाठक से आप निश्चिन्त रहें । यह पकड़ने-धकड़ने का कार्य कुछ विशेष प्रकार के प्राणी करते हैं जिन्हे आलोचक कहते हैं
आप आलोचकों की चिन्ता न करें। उनका कार्य ही है आलोचना करना।बताना कि अमुक कहानी ,किस कहानी की नकल है.। मूल कहानी में नायक कहाँ-कहाँ छींका था जो आप की कहानी में छूट गया है। वह उनकी अपनी शैली है जिसे वह ’खोज परक’ शोध कहते हैं। आप का क्या है । आप ’मास’ के लिए लिखतें हैं ’मासिक" पर लिखते हैं’ । सर्वहारा वर्ग के लिए लिखते हैं तो आलोचकों का क्या बिगड़ता है? वैसे रहस्य की बात बता दूँ। इन छुट भैयो की आलोचना मूलत: अपनी नहीं होती। "होल-सेलर’ से खरीदते हैं और ’रिटेल’ में बेच देते है।अपना-अपना व्यापार है।वह साहित्य की सेवा अपनी विधा में करते हैं ,आप अपनी विधा में करे-नकल विधा में।
हाँ, तो पाण्डुलिपि पूर्ण हुई।रहस्य की बात है कि इन्ही कुछ मिर्च-मसालों से, फार्मूला फिल्म के तरह ,मुम्बईया फिल्म शैली में,कई कहानियाँ ताबड़-तोड़ लिख मारी। संपादकों की ’सखेद-सधन्यवाद ’ कॄपा दॄष्टि से छ्पनी तो थी नहीं। तो सोचा स्वयं ही संग्रह बना छ्पा डालें। अन्तरात्मा नें पीठ ठोंकी ,वाह ! वाह ! क्या अभिनव प्रयोग है ! हिंदी कहानी में ’रूपान्तरवाद"-नकलवाद? इस नवीन वाद का प्रयोग हमारे ही कहानी संग्रह से प्रारम्भ हुआ और इसी से खत्म भी। कहते हैं कोणार्क मन्दिर अपने युग के समकालीन मन्दिरों में सबसे अन्त में निर्मित हुआ था और सबसे पहले ध्वस्त हुआ था । अत: मेरे वाद का कोई नामलेवा न बचा।
अभी प्रस्तावना लिखना शेष था । दूल्हे के सर पर ’सेहरा’ नहीं तो रीता है ,संग्रह प्रस्तावित नहीं तो फ़ीका है।सोचा ,दूर कहाँ जाएं, मुहल्ले में ही एक ’स्वनामधन्य’ ’लपक-प्रतिष्ठित" साहित्यकार हैं,लिखवा लेते हैं ।किसी कालेज़ में हिंदी विभागाध्यक्ष पद पर ’तिष्ठित’ हैं और यह पद उन्होने ’लपक’ कर लिया था।प्रयास करता तो यह प्रस्तावना मैं भी लिख सकता था । मगर अपने मुँह मियां मिठ्ठू कैसे बनता? सामयिक साहित्यकार क्या कहते!।
परन्तु उन तथाकथित महोदय ने जो प्रस्तावना लिखी ,वह भी हमारी शैली में लिखी-नकल प्रधान शैली। प्रतीत होता था सारी उम्र उन्होने कई पुस्तकों की मात्र प्रस्तावना ही पढ़ी होगी और घोंट-घांट कर एक मिश्रण तैयार कर दिया था जो हर रोग में दिया जा सकता था।यदि आप ने कहानी लिखी है तो वह आप की ’काव्य-चेतना’पर प्रकाश डालेंगे।’फैन्टेसी’ लिखी है तो ’यथार्थवाद’ पर। यदि कोई ’रोमान्स-कहानी लिखी है तो प्रस्तावना में आप के मुहल्लेवाली लडकी के प्रेम-प्रसंग की चर्चा कर कहानी में जीवन्तता व प्रासंगिकता स्थापित कर देंगे।ये सिद्धहस्त होते हैं। उन्होने जो प्रस्तावना मेरे संग्रह के लिखी थी उसका दूर-दूर तक कहीं भी, मेरी कहानियों से नैतिक या अनैतिक संबंध नहीं था । पढा़ तो अन्तरात्मा चीत्कार कर उठी-’अरे मूढ पुरूष !कृशन चन्दर के गधे ! कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूढे बन माहि। अरे भद्र पुरूष !जब तू इतनी नकल-प्रधान कहानियां लिख सकता है तो नकल प्रधान प्रस्तावना नहीं लिख सकता क्या? उठ जाग, अन्तस की शक्ति को पहचान,जगा अपनी कुण्डलिनी और कर सत्यानाश हिंदी का....।
मेरी कुण्डलिनी न जगनी थी न जगी।उक्त स्वनामधन्य महापुरुष से प्रस्तावना लिखवाने में जो सुरा-सोम और दो-चार दिन का मध्याह्न व रात्रि भोज पर खर्च हुआ था,आय-व्यय देखते हुए ,उसी प्रस्तावना से काम चलाया।
मगर समर्पण? सोचा अब लौ नसानी ,अब ना नसैहॊं । अब अन्यत्र नहीं जाउँगा। स्वयं ही लिखूँगा ।मगर किसको?? उसको ,उस अंग्रेज़ी लेखिका को ,जिसकी कहानी का रूपान्तर गुप्त रूप से मैनें हिंदी में कर दिया था या उस ’रशियन’ को जिसकी मूल कहानी को हिंदी में क्षत-विक्षत कर दिया था ,या उस चेकोस्लाविक लेखक को जिसकी कहानी का मैने ’मिक्स्ड-चाट’ बना दिया था ।सोचा बहुत सारे "उस" हो गए अत: सभी लेखकों को श्रद्धा व सम्मान देते हुए एक सर्वमान्य सन्तुष्ट शब्द " उसको" समर्पित कर देंगे। अन्तरात्मा ने पुन: दुत्कारा -"अरे आर्य पुत्र ! कुछ तो मौलिक कर ,समर्पण तो मौलिक लिख।
मेरा मौलिकत्व जाग उठा।समस्त मोह माया त्याग कर लिख मारी प्रथम पॄष्ठ पर प्रथम पंक्ति :--
" समर्पित है
अपनी "उसको"
जिसकी प्रेरणा से
यह संग्रह निर्विघ्न निकालना
सम्भव हुआ "
मगर हतभाग्य !न जाने किस दिशा से श्रीमती जी आ टपकीं।प्रथम पॄष्ठे अग्निपात:।पढा़ तो उबल पड़ीं। वाह! वाह ! क्या समर्पण किया है ! कौन है वह ’कलमुही ? सारी रात परेशान करें हमे , रात-रात भर काफ़ी बनाउँ मैं, कलम-दवात लाउँ मैं, बच्चे सुलाउँ मैं और समर्पण किया "उसको"? कौन है कुलच्छ्नी ,हराम....? अरे कॄतघ्नी पुरुष !हमारे तो भाग्य ही खोटे थे जो तुम जैसे ’ कलम-घिसुए’ से शादी हो गई।अरे! तुमसे अच्छा तो वह बनारस वाला दरोगा था । अहा ! क्या जवां मर्द था ! कम से कम ऊपरी आमदनी तो थी ,तुम्हारे जैसा चप्पल तो नही घिसता फिरता था।अरे ! वाह रे हिंदी जगत के प्रेमचन्द! कुछ तो शर्म हया रखी होती इन चश्मीली आँखों में । मुझको समर्पित न करता न सही मगर "उसको" तो न करता......."
श्रीमती जी चीखते-चीखते चिल्लाने लगीं। अन्तिम अस्त्र ,अचूक निशाना।आँखों से अश्रु की धारा ,मुँह से गालियों का (जो उल्लेख करने योग्य नहीं और सभ्य पाठकों के सुनने योग्य नहीं ) पनाला बहता रहा। तत्पश्चात ,उन्होने एक कठोर भीष्म-प्रतिज्ञा की जो प्रसंगानुकूल व समयोचित भी था।
" ऊपर चलते पंखे व नीचे ह्स्त-बेलन को साक्षी मान ,जो भी चर-अचर,कलम-दवात,स्थावर-जंगम,जड़-चेतन, जीव जगत में व्याप्त हैं और वह जन्तु जो उष्ट्रवत सम्प्रति कुर्सी पर बैठा है ,मेरा यह सत्य-वचन सुने।मैं आर्य-पुत्री ,जो भी मेरा नाम हो, एक श्वाँस में घोषणा करती हूँ यदि निकट भविष्य में किसी दूसरी शादी का सुखद सुयोग प्राप्त हुआ तो मैं किसी "कलम-घिसुए" से शादी नहीं करूँगी ....साथ ही यह भी सुने..."
संभवत: निकट भविष्य में उक्त सुखद सुयोग की क्षीण आशा से उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। मैने लाख समझाया स्पष्टीकरण दिया ,स्थिति स्पष्ट की ,परन्तु मेरे इस लप्पो-चप्पो नवनीत लेपन का प्रभाव न पड़ना था ,न पडा़। न मानना था,न मानी।
००००० ०००००० ०००००
पाठकों की जानकारी के लिए ,जिस संग्रह की लेखन नींव ही ऐसी हो ,उसका छपना क्या ,उसका बिकना क्या।प्रकाशक महोदय सारी प्रतियां घर पर पटक गये । और अब मैं आजकल हर मिलने-जुलने वाले आगन्तुक को एक-एक प्रति भेंट कर रहा हूँ-चाय-पानी-नाश्ते के साथ। हानि-लाभ की बात छोड़िए । स्पष्ट हो गया होगा कि यह मेरा प्रथम दुस्साहस व अन्तिम प्रयास है। बकौल बाल स्वरूप ’राही’ जी---

कौन बिजलियों की धमकियाँ सहता
खुद आशियां अपना जला दिया मैंने

॥अस्तु॥


---आनंद पाठक

शनिवार, 1 अगस्त 2009

एक व्यंग्य : नेता जी और पंचतंत्र

एक व्यंग्य : नेता जी और पंचतंत्र ..
प्राचीन काल की बात है किसी नगरी में नेता जी नामक एक प्राणी रहा करते थे उनके कार्यकाल में ,नगर में सर्वत्र शान्ति थी नागरिक गण अपना-अपना कार्य बड़ी लगन व निष्ठा से कर रहे थे .किसी कार्य के लिए 'सोर्स-पैरवी ' लगवाना एक निकृष्ट कार्य समझा जाता था। लोग अपनी योग्यता व दक्षता के बल से आगे बढ़ते थे।परस्पर प्रेम व भाई चारा व सौहार्द्र था।नेता जी प्राय: अपने निर्वाचन क्षेत्र में ही भ्रमणरत रहा करते थे।प्रगति की बात किया करते थे समस्यायें सुनते थे। तब आज कल जैसे बहु बहु संख्यक ,अल्पसंख्यक,दलित,पीड़ित ,शोषित वोट बैंक नहीं हुआ करते थे। चुनाव जो भी होता था सादगी से होता था ।पारदर्शिता थी ।वह सतयुग था।
युग बदला ,नेता जी बदले।अब वह निर्वाचन क्षेत्र में नहीं रहते ,लखनऊ दिल्ली करते रहते हैं और स्पीकर के सामने होने वाली परेडों में परेड करते रहते हैं।जनता के सेवक हैं । जनता की सेवा करते करते कुछ बस, ट्रक, होटल ,सिनेमा हाल , मल्टीप्लेक्स ,पेट्रोल पम्प आदि के मालिक बन बैठे हैं। फ़िर अपनी इसी चल-अचल सम्पत्ति से जनता कि सेवा करते है. और यह सेवा चुनाव काल में मुफ़्त हो जाती है -मतदाताओं को बूथ तक ले जाने-ले आने के लिये।
उस काल में भी विपक्ष था । आलोचना होती थी। जम कर होती थी-नीतियों की, विचारों की।एक स्वच्छ ,स्वस्थ व शुचि परम्परा थी । विचारों में शुचिता थी। आज कल की तरह नहीं कि चरित्र-हनन ही कर देते हैं।कीचड़ उछाल देते हैं । उस समय भी जब नेता जी यौवनपूर्ण थे ,साथ में दो-चार लठैत रखते थे ,कितनी औरतों से वैध-अवैध संबंध थे पर ऐसे सम्बंध कभी आड़े नहीं आये। और अब? वृद्धावस्था में? कीचड़ उछालते हैं?....घर की नौकरानी के साथ...राम राम राम । राजनीति किस स्तर पर उतर आयी है?
नेता जी का अपना एक छोटा सा दरबार है और दरबारी भी।कुछ खानदानी ,कुछ पारवारिक। खानदानी दरबारी का बाबा भी इसी दरबार में मत्था टेकता था ,अब वह टेक रहा है।नेता जी मालिक हैं ,रोजी-रोटी का जुगाड़ हो जाता है ,खर्चा-पानी निकल आता है।पारवारिक दरबारी की नस्ल ही और होती है। उसके रीढ़ की हड्डी नहीं होती और ’विवेक’ नेता जी के पास श्रद्धा समर्पित गिरवी पड़ा रहता है। तन इनका ,मन नेता जी का।ऐसा दरबारी , परिवार के एक सदस्य की भाँति होता है जो घर के हर छोटे-बड़े को मीठा प्रेम-पूर्ण संबोधन लगा कर बोलता है ’मांजी,बाबू जी,भैया जी ,बबुआ जी’बहू जी ,बड़ी दीदी । और परिवार का हर सदस्य उसे पुकारता है "भोलवा" ! अरे ! कहाँ मर गया स्साला ? भोला सिंह एक ऐसा ही दरबारी था।
एक दिन ,नेता जी दरबार कक्ष में बैठ देश-विदेश (अपने नगर की नहीं)की गिरती स्थिति पर विचार-विमर्श कर रहे थे .देश किधर जा रहा है?क्या होगा मेरे सिंचित निर्वाचन क्षेत्र का?कौन संभालेगा मेरी यह चल-अचल सम्पत्ति? कौन होगा मेरा उत्तराधिकारी?कैसे पार लगेगी देश की डूबती हुई नैया?कैसे सम्भलेगा मेरा यह देश? लगा द्द्दा के कर्ण समीप प्रदेश के कुछ बाल और सफेद हो गये। चेहरे पर झुर्रियाँ और बढ़ गईं।
’दद्दा !छोटके बबुआ जी को अब राजनीति में आ जाना चाहिये देश के स्थिति संभालने औ सुधारने के लिए।देश पुकार रहा है।बबुआ जी क युवा वर्ग में विशेषत: निठ्ठ्ल्लुओं में बड़ा मान-सम्मान है।परमाणु निरस्त्रीकरण पर अमेरिकी दबाव का मुकाबला आराम सेकर लेंगे बबुआ जी।"-भोला सिंह ने अपनी स्वामी-भक्ति प्रगट की।
नेता जी चिन्ताग्रस्त हैं । माथे पर रेखाएं और गहरा गईं। बबुआ अभी छोटा है ,बच्चा है ।राजनीति का दाँव-पेंच नहीं समझता।कितना विशाल है यह देश !कैसे संभालेगा वह पतवार ? और साहबजादे हैं कि दिन भर आवारागर्दी से फ़ुर्सत ही नहीं मिलती उन्हें। सुबह ही सुबह हीरो होण्डा लेकर न जाने कहाँ फ़ुर्र हो जाते हैं। नालायक ,कमीना। नेता जी ने अपने सुपुत्र के लिए एक मनोगत गाली उचारी ? मगर प्रत्यक्ष...
" अरे नहीं भोलवा !बबुआ की उमर ही क्या है !कच्चा है ,राजनीति की पकड़ नहीं।’-नेता जी ने आशंका प्रगट की
" उ हमरा पर छोड़ दीजिये मालिक !हम सब व्यवस्था कर देंगे।आप के सेवा में सगरी उमर कट गई ,तनिक बबुआ जी की सेवा में कट जाए तो जिनगी सुआरथ हो जाए ,मालिक’-भोला सिंह करबद्ध हो दद्दा के श्री चरणों में झुक गया। रीढ़ विहीन प्राणियों को यही तो सुविधा है । झुकने में कष्ट नहीं होता ।
भोलासिंह ने युक्ति जताई। तय हुआ उचौरी ग्राम के प्राइमरी स्कूल के अध्यापक पण्डित विष्णु शर्मा जी की सेवाएं ली जाय।वह छोटके बबुआ जी को दाँव-पेंच ,जोड़-तोड़ में प्रवीण करें।शर्मा जी ज़िलास्तर के ख्याति प्राप्ति शिक्षक हैं।कई मूर्ख बालकों को शिक्षक और नेता बना चुके हैं ।और जो वंचित रह गये वो आज कल व्यंग्य लिख रहे है। पूर्व काल में भी इनकी सेवाएं ली गई थीं जब दक्षिण प्रदेश के महिलारोप्य नामक नगर के राजा अमर शक्तिसिंह्के तीन मूर्ख बालकों को पंचतन्त्र की रचना कर ,शासन संचालन के योग्य बना चुके थे ।इस क्षेत्र में शर्मा जी की दक्षता राजनीतिक ,उठापटक ,दांव-पेंच, गुणा-भाग,निश्चय ही संदेह से परे था ।कितनी सरकारें आईं,गईं,कितने शिक्षाधिकारी आए ,गए,मगर शर्मा जी उसी स्कूल में उसी पद पर विगत बीस वर्षों से पद्स्थापित हैं।दिवाकाल खेत में पानी पटाते हैं ,रात्रि काल में राजनीति लड़ाते हैं।छुट्टियों में शिक्षाधिकारियों के यहाँ मौसमी सब्जियाँ ,फल-फूल पहुँचाते हैं।छोटके बबुआ को प्रशिक्षित करने का कार्य यदि इन्हे सौंप दिया जाय तो देश का भविष्य सुरक्षित रहेगा।तय हुआ। विष्णु शर्मा जी बुलाए गये।दरबार लगा है।दरबारी बैठे हैं।नव-दरबारी निरर्थक बाहर भीतर आ जा रहे हैं अपना प्रभाव जताने के लिए।विचार-विमर्श चल रहा है,समस्याओं पर तर्क-वितर्क ,चिन्तन-मनन प्रगति पर है कि शर्मा जी ने हाथ जोड़ कर प्रवेश किया।
" रे शर्मा !’- नेता जी ने अपनी शैली में स्वागत किया और कहा-" तुम्हें याद है जब तेरा तबादला पास वाले स्कूल पर हो गया था तो मैने ही रूकवाया था।’
"जी हुजूर ,कैसे भूल सकता हूँ ,कॄतघ्नता होगी। कितनी मेहनत की थी सरकार ने लख्ननऊ -दिल्ली एक कर दिया था सरकार ने। मेरे लिए कोई आदेश हो तो मालिक कहें।"- शर्मा जी सर झुका तैयार हो गये आदेश ग्रहण करने के लिए।
’चलो अच्छा हुआ। याद तो है.हम समझे कि भूल ही गया होगा।"-नेता जी एक हँसी हँसी ,दरबारियों ने अपनी हँसी मिलाई,अन्त में शर्माजी ने अपनी ही ! ही !हो!हो! मिला कर श्रीवृद्धि की।
" तो सुन ! छोटके बबुआ है न ,जरा इनका....."-दद्दा ने कहा-"...बाकी भोलवा समझा देगा"
अपने प्रति इस अयाचित सम्मान हेतु ,भोलासिंह जरा उचक कर तन गए और शर्मा जी को तुरन्त लेकर बाहर निकल आए शेष कार्य समझाने हेतु।
छोटके बबुआ ,शर्मा जी के संरक्षण में चले गये । राजनीति में प्रवीण करना है ।शर्मा जी ने एक बार फ़िर पंचतन्त्र के अपने पुराने पात्रों को स्मरण किया, कहानी रचनी थी,बबुआ को सुशिक्षित करना था।समस्त पुराने पशु पात्र ’करटक’ ’दमनक’ ने हाथ जोड़ कर अति विनम्र प्रार्थना की।
" पण्डित जी !इस बार हमें अपनी कहानियों के पात्र न बनाएं।प्राचीन काल के बात और थी।तब आदमी, जानवरों की बात सुनता था ,समझता था ।अब? अब तो आदमी आदमी की ही बात नहीं सुनता है,जानवरों की भाषा में बात करता है।अत: लोकतन्त्र की कहानियों का हमें पात्र बना ,हमारा अपमान न करें महाराज !"
पण्डित जी ने विचार-मन्थन किया । बात में कुछ-कुछ औचित्य है । अत: शर्मा जी ने पंचतन्त्रीय कहानियाँ त्याग ,लोकतन्त्रीय कहानियों की रचना की। पशु-पात्रो को छोड़ ’पशुवत" पात्रों को लिया।गम्य व सुबोधजन्य। सरपंच जी,मुखिया जी,प्रधान जी,थानेदार,तहसीलदार ,नेता .मन्त्री, दरबारी ,पटवारी,व्यापारी,नामी गिरामी स्वामी एक-एक पात्र की कहानी रची।
कैसे पटवारी ने ’हरेन्द्र’ की जमीन ’महेन्द्र’ को नाप दी,कैसे ’मनतोरनी’ हत्याकाण्ड में प्रधान जी बरी हो गये।गत माह की डकैती में मुखिया जी ने कैसे थानेदार साहब को पटा लिया और ’हरहुआ" को फंसवा दिया । कैसे ’पानी परात को हाथ छुऒ नहीं" और मन्त्री जी लाखों डकार गये।’रिन्द के रिन्द रहे सुबह को तौबा कर ली’। कैसे बाबू साहब ने बूथ- कैप्चरिंग करवाई और ’छमिया" बलात्कार केस फाईलों में पड़े-पड़े दम तोड़ गई। घोटालों का सूट्केस से क्या संबंध है। हवाला का पाउडर कितने काम का ,चुनाव काल में उडा़ते रहो ,जनता की आँख में झोकते रहो...और जनता सोचती है...कुछ हुआ तो ज़रूर है मगर दिखाई नहीं देता.....वगैरह..वगैरह
शर्मा जी बड़ी लगन व मनोयोग से शिक्षा दे रहे हैं ।एक-एक बारीकियाँ समझा रहे हैं,एक-एक का सम्यक पाणनीय विश्लेषण बता रहे हैं बिल्कुल आचार्य व गुरुकुल परम्परा की तरह। समझा रहे हैं अफसरों ने कैसे हनुमान चालीसा पढ़ सूक्ष्म रूप धारण कर लिया और सी०बी०आई० के सुरसा मुख से अक्षत बाहर निकल आए।कैसे सी०बी०आई० जाल फेक रही है कि बड़ी मछलियाँ तो जमानत पर रिहा हैं और छोटी मछलियाँ फँस रही हैं।
००० ००००० ००००
शिक्षा पूर्णोपरान्त शर्मा जी छोटके बबुआ को साथ लेकर दरबार में उपस्थित हुए बिल्कुल द्रोणाचार्य की तरह।
"मालिक आप के आदेशानुसार मैने अपना कर्तव्य निभा दिया।बबुआ जी की शिक्षा-दीक्षा पूर्ण हुई।आशा है आप की आकांक्षाओं एवं आशाओं के अनुरूप उतरेंगे..देश की बिगड़ती हुई स्थिति को संभाल लेंगे...देश को डूबने से बचा लेंगे.."
गुरु-दक्षिणा स्वरूप ,आगामी और दो वर्ष उसी गाँव ,उसी स्कूल,उसी पद पर रहने का एक अदद आश्वासन पा प्रसन्न मन बाहर आ गये।
००० ००००००
छ्ह महीने बाद
नगर में डकैती ,लूट ,बलात्कार,अपहरण की घटनाएं बढ़ गईं। दंगे-फ़साद होने लगे।दिनोदिन घोटाले,हवाला,चोर-बाजारी की घटनाएं बढ़ने लगी ।यत्र-तत्र जनता त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगी
दद्दा आश्वस्त हैं । बबुआ प्रवीण हो गया।उनकी चल-अचल संपत्ति संभाल लेगा। देश सुरक्षित रहेगा।
।अस्तु।
-आनन्द

शनिवार, 25 जुलाई 2009

एक व्यंग्य : सखेद सधन्यवाद ,....

इधर विगत कुछ दिनो से जब मेरी रचनाएं ’सखेद सधन्यवाद’ वापस आने लगी तो मुझे हिंदी की ’दशा’ व ’दिशा’ दोनों की चिन्ता होने लगी।अब यह देश नहीं चलेगा। रोक देंगे हिंदी के विकास रथ को ये संपादकगण। ले डूबेंगे हिंदी को ये सब।जितने उत्साह व तत्परता से मैं अपनी रचना भेजता था उससे दूने उत्साह से संपादकगण उसे ’सखेद सधन्यवाद’कर देते थे। कहते हैं कि कुछ अति उत्साही युवा संपादक तो अपनी प्रेमिका के ’प्रेम-पत्र’ भी ’सखेद सधन्यवाद’कर देते है ;और प्रौढ़ संपादकों की प्रौढ़ पत्नियाँ तो ’सखेद सधन्यवाद’ मायके में पड़ी पड़ी ’कर्म’ का रोना रोती रहती हैं ।
वैसे रचनाएं लौटती तो बहुतों की हैं ,मगर प्रत्यक्ष प्रगट नहीं करते ।यदि किसी ने पूछ लिया तो कहते हैं -’भईए !मैं छ्पास में विश्वास नहीं करता ।मैं तो ’स्वान्त: सुखाय ,बहुजन हिताय’ लिखता हूँ ।यदि मेरी रचना से इस असार संसार का एक भी प्राणी प्रभावित हो जाय तो मैं अपनी रचना की सार्थकता समझूँगा।यही मेरा पुरस्कार है ,यही मेरा सुख। यह बात अन्य है कि यह हितकारी कार्य अब तक नहीं हुआ है। पत्रिका कार्यालयों में तो वह संपादकों की आरती उतारने जाते हैं। अगर भूले-भटके ’फ़िलर-मैटेरियल’ के तौर पर यदा-कदा कोई रचना छ्प भी गई तो अति श्रद्धाविनत हो कहते हैं-’अरे क्या करें ! यह पत्रिकावाले मानते ही नहीं थे,बहुत आग्रह किया तो देना ही पड़ा।
फ़िर रचना की छ्पी प्रतियां बन्दरिया की तरह सीने से लगाए गोष्ठी-गोष्टी घूमते रहते हैं
मैं उन लोगो में से नही। स्वीकरोक्ति में विश्वास करता हूँ। जब कोई रचना वापस आ जाती है तो मैं भगवान से अविलम्ब प्रार्थना करता हूँ ’हे भगवान दयानिधान ! इन संपादकों को क्षमा कर इन्हे नहीं मालूम कि यह क्या कर रहे हैं ,हमें यह नहीं मालूम कि हम क्या लिख रहे हैं’
सत्य तो यह है कि मेरी कोई रचना आज तक छ्पी ही नहीं। ’सखेद सधन्यवाद’ की इतनी पर्चियां एकत्र हो गई हैं मेरे पास कि इण्डिया गेट पर बैठ आराम से "झाल-मुढ़ी’ बेंच सकता हूँ। वैसे बहुत से लेखक यही करते हैं मगर जरा बड़े स्तर पर। अपने अपने स्तर का प्रश्न है।
"मिश्रा ! अब यह देश नही चलेगा ,हिंदी भी नहीं चलेगी।"- मैने लौटी हुई समस्त रचनाओं की पीड़ा समग्र रूप से उड़ेल दी।
" क्या फिर कोई ’अमर’ रचना वापस लौट आई है?’-मिश्रा ने पूछा
"अरे! तुम्हे कैसे मालूम?"-मैनें आश्चर्यचकित होकर पूछा
"विगत पाँच वर्षों से तुम यही रोना रो रहे हो.। सच तो यह है बन्धु ! भारतेन्दु काल से लेकर ’इन्दु काल’ (कवि या कवयित्री यदि कोई हों) तक हिंदी ऐसे ही चल रही है ।सतत सलिला है ,पावन है । सतत प्रवाहिनी गंगा कैसे मर सकती है?
मिश्रा जी अपने इस ’डायलाग’ पर संवेदनशील व भावुक हो जाया करते है और हिंदी प्रेम के प्रति आँखों में आँसू के दो-चार बूँद छ्लछ्ला दिया करते हैं।
’परन्तु गंगा में प्रदूषण फैल तो रहा है न’- मैने उन्हें समझाना चाहा
’ज्यादा कचरा तो यह ’बनारस’ वाले डालते हैं’- उन्होने मेरी तरफ़ एक व्यंग्य व कुटिल मुस्कान डालते हुए कहा
’और इलाहाबाद वाले क्या कम प्रदूषित करते हैं’-मैने भी समान स्तर के व्यंग्यबोध में प्रतिउत्तर दिया
’देखिए मैं कहे देता हूँ ,मेरे शहर को गाली मत दीजिए’
’तो आप ने कौन सी आरती उतारी है’
’आप ने इलाहाबाद को पढा है? आप कैसे कह सकते है कि कचरा इलाहाबाद वाले डालते हैं?’
’क्यों नहीं कह सकता? जिस ज्ञान से आप बनारस वालों को कह सकते हैं’
’तुम्हारी इसी संकीर्ण मानसिकता से तुम्हारी रचानाएं वापस आ जाती है।अरे! मैं तो कहता हूँ कि वह संपादक भले हैं जो ऐसा कचरा लौटा देते हैं ,वरना तुम्हारा लेखन तो लौटाने योग्य भी नही है’
मैं ’हिटलर" की तरह फ़ुफ़कारने वाला ही था,फ़ेफ़ड़े में श्वास भर ही रहा था कि मिश्रा ने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया। ’सखेद सधन्यवाद’ वाली नस।मैं ’हिटलर’ से ’बुद्ध’ बन गया।कहा-
’मिश्रा ! हिंदी का भट्ठा कचरे से नहीं बैठता ,बैठता है हमारी-तुम्हारी लड़ाई से।
मिश्रा जी ठण्डे हो गये। हिंदी के साहित्यकार थे/
’मगर मिश्रा जी, हमें तो इसमें संपादकों का कोई बड़ा षड्यन्त्र लगता है। विदेशी मीडिया का भी हाथ हो सकता है।हो सकता है कि किसी पड़ोसी देश की राजनैतिक साजिश हो कि हिंदी को पनपने ही न दो, पाठक जी की सारी रचनाएं सखेद सधन्यवाद वापस करते रहो। हमें इसके विरुद्ध एक सशक्त आन्दोलन चलाना चाहिए,एक बड़ा संघर्ष छेड़ना चाहिए।
" मगर हिंदी में संघर्ष तो खेमा से चलता है.बड़ा खेमा ,बड़ा संघर्ष ।बारह खम्भे ,चौसठ खूँटा।"
" अरे है ना, जुम्मन मियाँ से कह कर बड़ा खेमा लगवा लेंगे"
"और योद्धा?"
" हैं न ,हम ,तुम और वो"
"वो कौन?- मिश्रा ने सशंकित दॄष्टि से देखा
"वो? अरे वह नुक्कड़ का पाण्डेय पानवाला,जब तक पान लगाता है मेरी कविता बड़े चाव से सुनता है। और जानते हो?असली योद्धा तो दो-चार ही होते हैं,अन्य तो मात्र ’बक-अप’ बक-अप’ करते रहते हैं"- मैनें मिश्रा जी की जिज्ञासा शान्त की।
आन्दोलन छेड़ने के लिए मानसिक धरातल तैयार कर लिया। कुछ अग्नि-शिखा से शब्द,कुछ विष-सिक्त वाक्य रट लिए।आन्दोलन का शुभारम्भ स्थानीय स्तर से हो तो उत्तम है। दुर्वासा बन कर एक स्थानीय संपादक के कार्यालय में घुस गया और फुँफकारते हुए कहा-
"आप लोगो ने सत्यानाश कर दिया है हिंदी का।’
" आप जैसे कितने कुकुरमुत्ते उग आए है आज कल।"- उक्त संपादक दूसरा दुर्वासा निकला
"देखिए ! कुत्तों को गाली मत दीजिए "- मैने कुत्तो के प्रति समर्थन जताते हुए कहा
"क्यो न दूँ ,यहाँ जो भी आता है अपने को प्रेमचन्द बताता है। चैन से सोने भी नहीं देते उस महान आत्मा को"
"आप ने मेरी रचनाएं पढी है?"
" पढ़ी है ,अरे मैं पूछ्ता हूँ कि वात्सायन (कामसूत्र वाले) से आगे भी कुछ लिखा गया है कि नहीं?
" जब तक आप अतीत से जुड़ेगे नहीं...’काम’ से जुड़ेगे नहीं...."
इससे पूर्व कि मैं अपनी बात पूरी करता ,दो लोगो ने मुझे सशरीर उठा कर ’सखेद सधन्यवाद ’ कर दिया।
०० ००००० ००००
मिश्रा जी सुबह सुबह आ गये।
" मिश्रा जानते हो ,कल मैं एक संपादक से मिला था ।खूब खरी-खोटी सुनाई। मैने कहा कि आप लोगो ने हिंदी का सत्यानाश कर रखा है"
" अच्छा ! -मिश्रा जी उत्सुक हो सुनने लगे -" तो क्या कहा उसने’
’यही तो रोना है ,कहा कुछ भी नहीं ,सशरीर सखेद कर दिया अपने कक्ष से "
अभी युद्ध वर्णन चल ही रहा था कि डाकिए ने आकर एक लिफ़ाफ़ा थमाया। खोला तो देखा रचना प्राप्ति व प्रकाशन-स्वीकृति पत्र था। मन ही मन नतमस्तक हुआ उस संपादक के प्रति।उसके हिंदी प्रेम के प्रति । अरे! क्या हुआ जो उसकी पत्रिका वर्ष में एक बार छपती है। छपती तो है न ।ग्रामीण पॄष्ट भूमि की.गाँव की सोंधी मिट्टी से जु्ड़ी, जहाँ भारत की आत्मा आज भी बसती है ।
" देख मिश्रा ,मैं कहता था न , अब भी कुछ सुधी संपादक हैं"
"और वह खेमा? वह आन्दोलन?"
" छोड़ो यार ! बाद में देखेंगे ।अभी मुझे अगली रचना भेजनी है"
और मैं अपनी कलम में स्याही भरने लगा।
।अस्तु।
-आनन्द

रविवार, 19 जुलाई 2009

सुदामा की खाट

प्रिय मित्रो !
"सुदामा की खाट’- मेरा दूसरा सद्द: प्रकाशित व्यंग्य-संग्रह’ है.जिसमें विभिन्न सामाजिक विद्रूपताओं पर लिखे गए १७ व्यंग्यों का संकलन है’ ।इस पुस्तक का प्रकाशन
’अयन प्रकाशन
१/२० ,महरौली ,नई दिल्ली ,११० ०३०
दूरभाष ०११-२६६४५८१२
ने किया है
आशा करता हूँ सुधी पाठकों को यह संग्रह पसन्द आयेगा
०० ०००
पुस्तक की भूमिका से----
’बात जहां पर तय होनी थी किस पर कितने चढ़े मुखौटे
जो चेहरे ’उपमेय’ नही थे ,वो चेहरे ’उपमान’ बन गये
सच। यह एक विडम्बना है-सामाजिक विडम्बना।आप के आस-पास दिखते हुए चेहरे -अनेक चेहरे। कोई चेहरा साफ़ नहीं,स्पष्ट नही,निश्छ्ल नहीं।बाहर कुछ-भीतर कुछ। जो वह है -वह दिखता नहीं। जो दिखता है- वह है नहीं।हर चेहरे पर एक चेहरा-हर मुखौटे पर एक मुखौटा।कभी मगरमच्छ की तरह आँसू बहाता,कभी गिरगिट की तरह रंग बदलता ,कभी तोते की तरह आँखे फेर लेता है। वह आदमी नहीं ’वोट’ पहचानता है ,वोट बैंक पहचानता है । गिनता है मॄतक किस पार्टी से संबद्ध था ,देखता है ।उस पर भी
विडम्बना यह कि वह स्वयं को ’हिप्पोक्रेट’ नही मानता ,अवसरवादी नही मानता अपितु इसे सीढियां मानता है-सफलता की सीढियां।
........ सच बोलने पर बुरा मानते लोग..,आइना दिखाने पर पत्थर उठाते लोग,... झूठे आश्वासनों का बोझ ढोता... ’बुधना’ ,गरीबी रेखा के नीचे दबा आम आदमी... ’वोट’ के लिए नित नए-नए स्वांग रचते लोग...रंगीन तितलियों से खेलते सत्ता के दलाल...रोटी माँगने पर भीड़ पर गोली चलाती व्यवस्था...कर्ज़ के बोझ से दबे आत्महत्या करते किसान...बारूद की ढेरी पर बैठा शहर...कुर्सी की खातिर सिद्धान्तों व मानवीय मूल्यों को तिलांजली देती पार्टियां...’सुदामा की खाट" पर कब्जा किए हुए युवा सम्राट..क्या काफी नही है
एक संवेदनशीलमना व्यक्ति को उद्वेलित करने के लिए.? संवेदना ज़िंदा है तो हम आप ज़िंदा हैं अन्यथा जब संवेदना मर जाएगी तो ’ बिल्लो रानी’ चाहे ज़िगर मा आग से ’बीडी़’ जला लें या बम्ब धमाके से ५० मरे -मात्र एक समाचार से ज्यादा कुछ नही होगा......
--आनन्द

शनिवार, 11 जुलाई 2009

एक व्यंग : एक इन्टरव्यू मेरा भी....

जब से प्रसारण क्रान्ति आई ,टी०वी० चैनलों की बाढ़ आ गई। जिसको देखो वही एक चैनेल खोल रहा है।कोई न्यूज चैनेल,कोई व्यूज चैनेल।समाचार के लिए ८-१० चैनेल। दिन भर समाचार सुनिए ,एक ही समाचार दिन भर सुनिए। हिन्दी में सुनिए ,अंग्रेजी में सुनिए,कन्नड़ में सुनिए ,मलायलम में सुनिए. यदि आप धार्मिक प्रवृत्ति के हैं तो धार्मिक चैनेल देखिए-आस्था चैनेल देखिए ,संस्कार चैनेल देखिए। यदि आप युवा वर्ग के हैं तो एम०टी०वी० देखिए, रॉक टी०वी० देखिये । यदि आप हमारी प्रवृत्ति के हैं तो दिन के उजाले में भजन-कीर्तन देखिए ,रात के अन्धेरे में फ़ैशन टी०वी० देखिए- अकेले में।मेरी बात अलग है ,मैं अपने अध्ययन कक्ष में रहता हूँ तो फ़ैशन टी०वी० देखता रहता हूँ परन्तु जब श्रीमती जी चाय-पानी लेकर आ जाती हैं तो तुरन्त ’साधना’ चैनेल बदल भजन-कीर्तन पर सिर चालन करता हूँ । इससे श्रीमती जी पर अभीष्ट प्रभाव पड़ता है ।
उन दिनों, जब मैं जवान हुआ करता था तो यह चैनेल नहीं हुआ करते थे और जब मैं जवान नहीं तो १००-२०० चैनेल खुल गये। पॉप डान्स, रॉक डान्स,हिप डान्स,हॉप डान्स। उन दिनों ले-देकर एक ही चैनेल हुआ करता था-दूरदर्शन। शाम को २ घन्टे का प्रोग्राम आता था .आधा घंटा तो चैनेल का ’लोगो’ खुलने में लगता था -सत्यं शिवं सुन्दरम। फिर टमाटर की खेती कैसे करें ,समझाते थे ,धान की फ़सल पर कीट-नाशक दवाईयाँ कैसे छिड़के बताते थे । फिर समाचार वगैरह सुना कर सो जाते थे। सम्भवत: आज की जवान होती हुई पीढी को इस त्रासदी का अनुभव भी नहीं होगा।इन चैनलों से देश के युवा वर्ग कितने लाभान्वित हुए ,कह नही सकता परन्तु मेरे जैसे टँट्पुजिए लेखक का बड़ा फ़ायदा हुआ।चैनेल के शुरुआत में कोई विशेष प्रोग्राम या प्रायोजक तो मिलता नहीं तो दिन भर फ़िल्म दिखाते रहते हैं,गाना सुनाते रह्ते हैं या किसी पुराने धारावाहिक को धो-पोछ कर पुन: प्रसारण करते रहते हैं।’रियल्टी शो" के लिए कैमेरा लेकर निकल पड़ते हैं गली-कूचे में शूटिंग करने गाय-बकरी-कुत्ते-सूअर-साँड़-भैस।फ़िर चार दिन का विशेष कार्यक्रम बनाएगे दिखाने हेतु। नगर में गाय और यातायात की समस्या, बकरे कि माँ कब तक खैर मनायेगी देखिये इस चैनेल पर...सिर्फ़ इस चैनेल पर ..पहली बार ..ए़क्स्क्लूसिव रिपोर्ट..गलियों में सूअरों का आतंक....सचिवालय परिसर में स्वच्छ्न्द घूमते कुत्ते ,एक-एक घन्टे का कार्यक्रम तैयार...दिन में ३ बार दिखाना है सुबह-दोपहर-शाम ...दवाईओं की तरह ..समाज को स्वस्थ रखने हेतु।
एक शाम इसी चैनेल की एक टीम गली के नुक्कड़ पर ’ चिरौंजी" लाल से टकरा गई । संवाददाता संभवत: चिरौंजी लाल का परिचित निकला -’ अरे यार ! चिरौंजी ! तू इधर ? यार तू किधर?
इस इधर-उधर के उपरान्त दोनों अपने पुराने दिनों की यादों में खो गये परन्तु ’मिस तलवार" को याद करना दोनों मित्र नहीं भूले ."मिस तलवार...अरे वही जो...। चेतनावस्था में लौटते ही उक्त संवाददाता महोदय ने अपनी वास्तविक व्यथा बताई।
’यार चिरौंजी ! हिन्दी के किसी साहित्यकार का एक इन्टरव्यू करना है ,मुझे तो कोई मिला नहीं, जितने महान साहित्यकार हैं वो आज-कल विश्व हिंदी सम्मेलन में ’न्यूयार्क’ गये हुए हैं हिंदी की दशा-दिशा पर ,हिंदी को भारत की राष्ट्र -भाषा बनाने के लिये.हिंदी लेखन पर महादशा चल रही है न आज-कल । तू इस गली में किसी लब्ध प्रतिष्ठित हिंदी लेखक को जानता है?
’अरे है न ! पिछली गली में मेरे मकान के पीछे’
’अच्छा! क्या करता है?’
’अरे यही कुछ अल्लम-गल्लम लिखता रहता है ।मैं तो जब भी उसके पास गया हूँ तो निठ्ठ्ल्ला बैठ कुछ सोचता रहता है या लिखता रहता है। डाक्टर ने बताया कि यह एक प्रकार की बीमारी है . भाभी जी कहती हैं घर में काम न करने का एक बहाना है
’ अरे यार ! किस उठाईगीर का नाम बता रहा है ,किसी महान साहित्यकार का नाम बता न।’
अरे तू एक बार उसका इन्टरव्यू चैनेल पर दिखा न ,वह भी महान बन जायेगा. राखी सावंत को नही देखा ?
चिरौंजी लाल के प्रस्ताव पर सहमति बनी. इन्टरव्यू का दिन तय हो गया. तय हुआ कि इन्टरव्यू मेरे इसी मकान पर मेरे अध्ययन कक्ष में होगी.मैने तैयारी शुरु कर दी ,अपने अन्य साथी लेखकों से तथा कुछ कबाड़ी बाज़ार से पुरानी पुस्तकें खरीद कर अपने ’बुक-शेल्फ़" में करीने से सजा कर लगा दी. कैमरे के फ़ोकस में आना चाहिए।कमरे का रंग-रोगन करा दिया। श्रीमती जी ने अपनी एक-दो साड़ी ड्राई क्लीनर को धुलने को दे आईं..इन्टरव्यू में साथ जो बैठना होगा.मैने भी अपना खद्दर का कुरता ,पायजामा,टोपी, अंगरखा, जवाहिर जैकेट ,शाल वगैरह धुल-धुला कर रख लिया .राष्ट्रीय प्रसारण होगा ,दूसरी भाषा के लेखक क्या धारणा बनायेगे हिंदी के एक लेखक के प्रति.। अत: हिंदी की अस्मिता के रक्षार्थ तैयारी में लग गया। कुछ स्वनामधन्य लेखकों के इन्टरव्यू पढे़ ,अखबार की कतरने पढी़
००० ०००००० ०००००००
नियति तिथि पर चैनेल वाले आ गये।कैमरा नियति कोण पर लगाया जाने लगा. फ़ोकस में रहे.माईक टेस्टिंग हो रही थी । आवाज़ बरोबर पकडे़गी तो सही. इन्टरव्यू प्रारम्भ हो गया.
टी०वी०- आनन्द जी ! आप का स्वागत है. आप व्यंग लिखते है? आप को यह शौक कब से है?
श्रीमती जी बीच ही में बात काटते हुए और साडी़ का पल्लू ठीक करते हुए बोल पडी़- " आप शौक कहते है इसे? अरे रोग कहिए
रोग,मेरी तो किस्मत ही फ़ूट गई थी कि....
"आप चुप रहेंगी ,व्यर्थ में ....’ मैने डांट पिलाते हुए अपना पति-धर्म निभाया
’ हां हां मै तो चुप ही रहूगी ,३० साल से चुप ही तो हूँ कि आप को यह रोग लग गया. भगवान न करे कि किसी कलम घिसुए से...’
’ना माकूल औरत .’- मैने दूसरी बार पति-धर्म क निर्वाह किया
वह तो अच्छा हुआ कि कैमरा मैन ने कैमरा चालू नही किया था ,शायद वह भी कोई विवाहित व्यक्ति था\
मैं - " हाँ ज़नाब ! पूछिए"
टी०वी०--’आप व्यंग लिखते हैं? आप को यह शौक कब से है??
मैं --" ऎ वेरी गुड क्योश्चन ,यू सी ,एक्चुअली ...आई लाइक दिस क्यूश्चन ...आई मीन..यू नो..इन हिंदी...’ मैं कुछ कन्धे उचका कर कहने ही जा रहा था कि उस चैनेल वाले ने एक सख्त आदेश दिया -पिन्टू कैमेरा बन्द कर.फ़िर मेरी तरफ़ मुखातिब हुआ
टी०वी०-" सर जी ! आप हिंदी के लेखक हो ,हिंदी में लिखते हो तो इन्टरव्यू अंग्रेजी में क्यों दे रहे हो?
मैं-- क्यों? इन्टरव्यू तो अंग्रेजी में तो देते हैं न! देखते नहीं हो हमारे हीरो-हीरोइन सारी फ़िल्में तो हिंदी में करते हैं ,गाना हिंदी मे गाते हैं .संवाद हिंदी में बोलते हैं परन्तु इन्टरव्यू अंग्रेजी में देते हैं.जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वो भी ..यू सी..आई मीन..बट.आल दो..दैट्स आल....कह कर इन्टरव्यू देते हैं उन्हे तो कोई नहीं टोकता .वो लोग तो हिंदी से ऐसे बचते हैं कि हालीवुड वाला उन्हे कहीं गँवई-गँवार न समझ ले .फ़िर यह भेद-भाव हिंदी लेखक के साथ ही क्यों....?
टी०वी० -- वे फ़िल्मों में हिंदी की खाते है आप हिंदी को जीते है.सर आप अपनी तुलना उनसे क्यों करते हैं?
कुछ देर तक तो मुझे यही समझ में नहीं आया कि यह चैनेल वाला मुझे सम्मान दे रहा है या मुझ पर व्यंग कर रहा है
खैर ,इन्टरव्यू आगे बढ़ा
टी०वी०-- श्रीमान जी ! आप को व्यंग में अभिरुचि कब जगी?
मैं---- बचपने से.. वस्तुत: मैं पैदा होते ही व्यंग करने लग गया था .सच पूछिए तो मैं पैदाईशी व्यंगकार हूँ जैसे हर बड़ा एक्टर कहता है.बचपन में व्यंग करता था तो मां-बाप की डांट खाता था अब व्यवस्था को आईना दिखाता हूँ तो मार खाता हूँ
टी०वी० --- तो आप व्यंग लिखते ही क्यों हो?
मैं - क्या करुँ ,दिल है कि मानता नहीं
फ़लक को ज़िद है जहाँ बिज़लियाँ गिराने की
हमें भी ज़िद है वहीं आशियाँ बनाने की
टी० वी० -- आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर करते है?
मैं - - महोदय प्रथमत: आप अपना प्रश्न स्प्ष्ट करें .व्यंग करना और व्यंग लिखना दोनो दो बातें हैं
टी०वी० -- मेरा अभिप्राय यह है कि आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर कसते हैं
मैं-- श्रीमती जी पर । ज्यादा निरापद वही हैं। पिट जाने की स्थिति में पता नही चलता कि व्यंग के कारण पिटा हूँ या अपने
निट्ठल्लेपन के कारण पिटा हूँ .वैसे मुहल्ले वाले समझते हैं कि मैं अपनी बेवकूफ़ी के कारण पिटा हूँगा
ज़ाहिद व्यंग लिखने दे घर में ही बैठ कर
या वह जगह बता दे जहाँ न कोई पिटता होए
टी०वी० - बहुत से लोग व्यंग को साहित्य की विधा नहीं मानते ,आप को क्या कहना है
मैं -- भगवान उन्हे सदबुद्धि दे
टी०वी०-- सशक्त व्यंग से आप क्या समझते हैं?
मैं - सशक्त व्यंग कभी भी सशक्त व्यक्ति ,विशेषकर पहलवानों के सामने नहीं करना चाहिए.अंग-भंग की संभावना बनी रहती है.
टी०वी०- हिंदी व्यंग की दशा व दिशा पर आप की क्या राय है?
मैं- व्यंग की दशा पर महादशा का योग चल रहा है और दिशा हास्य की ओर।हास्य-व्यंग के बीच एक बहुत ही पतली रेखा है. आप
के लेखन से यदि आप के पेट में बल पड़ जाये तो समझिए की हास्य है और यदि माथे पर बल पड़ जाए तो समझिए कि
व्यंग है
टी०वी० आप क श्रेष्ठ व्यंग कौन -सा है?
मैं (कुछ शरमाते व सकुचाते हुए) यह प्रश्न तो बड़ा कठिन है .यह तो ऐसे ही हुआ जैसे लालू प्रसाद जी से कोई पूछे आप की इतनी
सन्तानों में सबसे प्रिय़ सन्तान...
टी०वी० फ़िर भी...
मैं अभी लिखा नही
टी०वी० तो भी..
मैं जो टी०वी० पर दिखाई जाए.जिस रचना पे सबसे ज्यादा एस०एम०एस० मिल जाय तो घटिया से घटिया रचना भी श्रेष्ट हो जाती है
टी०वी० सुना है आप ग़ज़ल भी लिख लेते हैं
मैं (कुछ झेंपते हुए) कुछ नहीं बस यूँ ही /वैसे गज़ल लिखी नहीं, कही जाती है.(मैने अपने इल्मे-ग़ज़ल का इज़हार किया।
फ़िर चैनेल वाला श्रीमती जी की तरफ मुखातिब हुआ ।तब तक श्रीमती जी ने अपना पल्लू वगैरह ठीक कर लिया था ताकि
प्रसारण में कोई दिक्कत न हो
टी०वी० भाभी जी ! आप की शादी हो गई है?
श्रीमती जी (शरमाते हुए) आप भी क्या सवाल पूछ रहे हैं ?
टी०वी० हम चैनेल वालों को पूछने पड़ते हैं ऎसे सवाल" इसी बात का प्रशिक्षण दिया जाता है हमें।यदि कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा
होता है तो भी हम ऎसे सवाल पूछते हैं हम चैनेलवाले.....भाई साहब ,आप को डूबने में कैसा लग रहा है...
खैर छोड़िए यह व्यक्तिगत प्रश्न .आप बतायें कि आप ने इन में क्या देखा कि आप इन पर फ़िदा हो गई?
श्रीमती जी इनकी अक्ल
मैं हाँ जब आदमी की अक्ल मारी जाती है तभी वह शादी करता है
श्रीमती जी नहीं ,इनका अक्ल के पीछे लट्ठ (व्यंग) लिये फिरना ।पापा की पेन की एजेन्सी थी ,चिरौंजी भाई साहब ने बताया था कि
लड़का कलम क धनी है । पापा ने सोचा कि कलम के धन्धे में इज़ाफ़ा होगा ...मुझे क्या मालूम था कि कलम का धनी कलम
घिसुआ होता है ...वह तो मेरे करम फ़ूटे थे कि.....
मैं हाँ हाँ मैं ही गया था तुम्हारे पापा के पास.....
सम्भवत: आगामी दॄश्य -श्रव्य की कल्पना कर कैमरामैन ने कैमेरा बन्द कर दिया था । अनुभवी विवाहित व्यक्ति जो था.। शूटिंग
खत्म ...इन्टरव्यू खत्म।
जाते -जाते मैने पूछ लिया ," भाई साहेब ,इस इन्टरव्यू क प्रसारण कब होगा??
टी०वी० सर जी ! अगले सोमवार को प्राइम टाइम नौ बजे...
पाँच साल हो गये वह ’अगला सोमवार नहीं आया। संभवत: वह चैनेल भी बन्द हो गया होगा अब तक तो।
अस्तु
--आनन्द

रविवार, 21 जून 2009

एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......

विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं - वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है अगर वह किसी हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता इसीलिए वह आजीवन अपने भाग्य को कोसती रहती हैं एक वह दिन कि आज का दिन वह तो विधि का विधान था कि इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए उस समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे ! भाग्यवान ! इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -

'रोटी कपडा और मकान
कवियों का इस से क्या काम
रोटी कपडा और मकान "

'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता सुनते-सुनते काश ! कि हम बहरे होते
ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए कहते हैं कि वह एक विदुषी महिला थीं
परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं और वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ से चाहें उतर सकता है बाएं से उतर सकता है ,दाएं से उतर सकता है .वह स्वतंत्र है स्वतंत्र लेखन करता है यह स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है यही कारण है की विवाहित कवि या तो 'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था . शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं) .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है -

तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है

'यह मकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम. वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना है मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा है आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है ज़रा इन पर कड़ी नज़र रखना लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे'र का मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद एक साया इधर भी रहता है
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच में लाने पर.
" कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें दिल-ओ-जान से रहती है ?'
'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं भेजी थी '
'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं '
'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ....
फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
अब ग़ज़ल का अगला शे'र क्या सुनाना
०० ०० ००००००
शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया होगा चलते हैं दूसरा शे'र सुनाते हैं -

ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है

अभी शे'र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी -"हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! "
"अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?"
"अरे! तुम्हारे कमीन - मकीन की "
"या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा मैंने तो यह शे"र तुम्हारी शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ...."
"पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा ...." बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
अब इस शे'र के मानी क्या समझाते अगला शे'र क्या सुनाते चुप ही रहना बेहतर समझा
०० ०००००००००
अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे'र सुनाना, न कोई ग़ज़ल इस से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा ...इसे मेरी औकात का क्या पता आज शाम नखास पर मुशायरा है बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने अपनी शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, करुण रस के कवि हैं तो रो-धो कर निपट गए मगर शायरी ! शायर को एक एक शे'र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए यहाँ भी 'ब्रांड-वैल्यू' बिकता है नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले 'तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए जाने के बाद 'तालियाँ' बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं यह प्रोग्राम वाले.
अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे'र अदायगी का रिहर्सल कर रहा था -

दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने -
वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं

पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा बेगम साहिबा हैं.-'वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे'र मारा है .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न जाने कब फाख्ता उड़ जाय ...वह भी हसरत पूरी कर लो ....'-बेगम साहिबा ने भडास निकाली .
'बेगम ! किसकी बात कर रही हो?'
'अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न '
'लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे'र समझने की तमीज नहीं तमीज होगी भी कैसे -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी '
'हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या आप के पास है '
'बेगम ! इस शे'र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन .....'
देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं .....वो तो मेरे करम ही फूटे थे की......'-कहते -कहते रो पडी

फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ वहां से जो भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें
अस्तु

-आनंद --

शुक्रवार, 12 जून 2009

एक व्यंग :विश्वासमत और छींक .....

राजनैतिक गहमागहमी व उठापटक के मध्य सदन-पटल पर एक पंक्ति का प्रस्ताव रखा गया - यह सदन सरकार के प्रति अपना विश्वास प्रगट करता है
अध्यक्ष जी ने ,सदन की कार्यवाई शुरू करते हुए चर्चा में भाग लेने हेतु 'क' जी का नाम पुकारा 'क' महोदय जैसे ही अपना पक्ष रखना शुरू किया -'माननीय अध्यक्ष जी ! इस सदन के माध्यम से मैं यह कहना चाहूँगा कि वर्तमान सरकार ..... तभी अचानक किसी ने बिना नाक पर रुमाल रखे एक जोरदार छींक मारी कि सारा सदन गूंज गया .सभी लोग उनकी ओर देखने लगे ज्ञात हुआ कि वह किसी विपक्षी दल के सदस्य थे
विश्वासमत पर बहस के प्रारम्भ में ही यह छींक ! किसी अनागत अनिष्ट कि आशंका से सत्तापक्ष चिंतित हो गया प्रथम ग्रासे मच्छिका पात: नहीं छींक पात: यह छींक शुभ नहीं है प्रस्ताव गिर सकता है .सरकार गिर सकती है सतापक्ष मैं बेचैनी बढ़ने लगी तभी अचानक सत्तापक्ष के एक त्रिशूलधारी सदस्य खड़े हो गए
'अध्यक्ष जी ! अभी-अभी विपक्ष के किसी मित्र ने इस भरे सदन में एक छींक मारी है जो उचित नहीं है .यह छींक किसी आने वाले अनिष्ट का संकेत मात्र है ...शास्त्रों में लिखा है ...
" सम्मुख छींक लड़ाई भाखे
छींक दाहिने द्रव्य विनाशे
"पहले आप बैठिये ! प्लीज़! "-अध्यक्ष महोदय ने आग्रह किया
" महोदय ! खेद है मैं यहाँ बैठने हेतु नहीं आया हूँ मैं अपने चुनाव क्षेत्र से खडा हो कर आया हूँ .क्षेत्र की समस्याओं को खडा करने आया हूँ .देश की ....'
"प्लीज़ आप चुप रहिये 'क' जी को अपनी बात कहने दीजिये .आप का जब क्रम आएगा तो अपनी बात कहियेगा '
" अध्यक्ष जी ! छींक तो उस ने अभी मारी है .जब अनिष्ट हो ही जाएगा ,विशवास मत गिर ही जाएगा तो कहने को क्या रह जाएगा !?
"नहीं ,नहीं, प्लीज़ उस से पहले आप को मौका दिया जाएगा."
" अभी आप बैठे ,प्लीज़ आप चुप रहे सदस्य 'क' को बोलने दें...'क' जी आप चालू रहे .'- अध्यक्ष जी ने अपनी व्यवस्था दी.
'क' जी ने गतांश से आगे कहना शुरू किया -."हाँ तो मैं कह रहा था कि....."
अचानक तीन-चार भगवाधारी सदस्य एक साथ खड़े हो समवेत स्वर में कहना शुरू किया ---"सर!यह छींक भारतीय संस्कृति से जुडा प्रश्न है..विशेषत: हिन्दू संस्कृति से. महोदय यह एक गंभीर प्रश्न है...
ऊँची छींक कहे जयकारी
नीची छींक होय भयकारी
" प्लीज़ !आप तीनो ,नहीं चारो बैठ जाए "क' जी को बात कहने दें.
" महोदय अगर हम बैठ गए तो हिन्दू-संस्कृति बैठ जायेगी ,करोडों हिन्दुओं का विश्वास बैठ जाएगा धर्म बैठ जाएगा . विश्वासमत पर छींक शुभ नहीं है."
" अध्यक्ष जी ,यह धरम-करम की बातें कर रहे हैं' -कई तिरंगाधारी के साथ खड़े हो गए.
"छींक विपक्ष के सदस्य ने मारी है "
"छींक 'क' जी के पृष्ठ भाग से मारी है इसका फलाफल प्रभाव कम होता है"-एक सदस्य ने चुटकी ली
'तो क्या ! मारी तो अध्यक्ष जी के सम्मुख ही न ! इसका प्रभाव अनिष्ट होता है '- किसी दूसरे सदस्य ने चुटकी ली.
'यह भारतीय संस्कृति की अस्मिता का प्रश्न है -कमंडलधारियों ने कहा
"यह सरासर 'कम्युनलिज्म' है '--लाल झंडा वालों ने कहा
'यह दलित सदस्य का अपमान है '- नीला झंडा धारियों ने कहा -" यह साजिश है षडयंत्र है '
'यह व्यवस्था का प्रश्न है '-एक खैनी-सुरती ठोकने वाले ने कहा
'प्लीज़ प्लीज़ आप लोग शांत हो जाए '-अंत में अध्यक्ष जी ने कहा -प्लीज़ आप बैठ जाए.'क' जी को अपनी बात कहने दें .हाँ 'क' जी आप चालू रहें '
विश्वास मत पर गंभीर बहस चल रही थी क्यों की स्थिति उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही थी.लोकतंत्र समृद्ध हो रहा था क्यों कि लोग चीखने -चिलाने कि कला में समृद्ध हो रहे थे.सदन में सरकार के भाग्य का फैसला होना है लोग देश कि अस्मिता पर बहस कर रहे थे,छींक पर बहस कर रहे थे .सच भी है .आदमी रहेगा तो छींक रहेगी ,छींक रहेगी तो संस्कृति का प्रश्न उठेगा.भारत कि अस्मिता का प्रश्न उठेगा.फिर देश रहेगा तो सरकार रहेगी.सरकार का क्या है ! आनी-जानी है.परन्तु नासिका-रंध्र से निकली छींक वापस नहीं जानी है.अत: विचार और बहस इस मुई छींक पर ही होनी चाहिए.
अध्यक्ष जी के आदेशानुसार 'क' महोदय ने अपना वक्तव्य गतांश से आगे पढ़ना शुरू किया -' धन्यवाद अध्यक्ष जी ! हाँ तो मैं कह रहा था कि जब से यह वर्तमान सरकार ...."
'महोदय यह व्यवस्था का प्रश्न है '- त्रिशूलधारी जे ने ,जो अबतक खड़े थे,गोला दागा -विश्वास मत पर बहस से पहले छींके गए अशुभ छींक जैसे गंभीर विषय पर बहस होनी चाहिए '
'अरे! आप अभी तक बैठे नहीं?प्लीज़ पहले आप बैठ जायें. '-अध्यक्ष जी ने कहा -'क' जी को अपनी बात कह लेने दीजिये /हाँ तो 'क' जी आप चालू रहें...
लोकतंत्र की आधी उर्जा सदस्यों को मनाने में लग जाती है और आधी उर्जा रूठे सदस्यों को चुप कराने में लग जाती है.सरकारी कार्य निष्पादन हेतु उर्जा बचती ही नहीं अत; सारे विकास कार्य बिना उर्जा के ही चलता है .यही भारतीय लोकतंत्र का 'आठवां' आर्श्चय है .
'क' जी ने कहना शुरू किया -'हाँ तो मैं कह रहा था कि यह सरकार .......
सदन के एक कोने से एक निर्दलीय जी अचानक उठ खड़े हुए और कहने लगे '....महोदय! विपक्षी पार्टियों की यह छींक कोई साधारण छींक नहीं है यह राजनैतिक छींक है एक सोची-समझी रणनीति के तहत छींक है यह एक साजिस है एक षडयंत्र है ...'
'प्लीज़ ! आप चुप हो जाए ,आप को भी मौका मिलेगा. पहले 'क' जी को अपनी बात कह लेने दीजिये प्लीज़ प्लीज़ ! नो नो इट इश नॉट फेयर .- अध्यक्ष जी ने कहा
" महोदय ! अगर मैं चुप हो आया तो मेरे क्षेत्र की जनता चुप हो जायेगी,देश गूंगा हो जाएगा .हो सकता है विश्वास मत गिर जाने के पश्चात पुन: चुनाव क्षेत्र में जाना पड़ जाए तो क्या मुंह दिखाऊंगा "
" मुंह नहीं ,मुखौटा दिखाना ...'-एक सदस्य ने चुटकी ली
निर्दलीय जी को न बैठाना था ,न बैठे .अपनी बात पर अडे रहे
"....तो क्या मुंह दिखाऊंगा .इस छींक में विरोधियों के साजिस की घिनौनी बू आ रही है ..." और झट से नाक पर एक रुमाल रखते हुए पुन: कहा --'...हमारे मित्र ने स्वयं नहीं छींका है उन से छींकवाया गया है कि विश्वास मत को अशुभ कर दें. इसमें किसी विदेशी शक्ति का भी हाथ हो सकता है .मैं नाम नहीं लेना चाहता परन्तु हम क्या ,आप क्या सारा सदन जानता है कि साथ वाली पार्टी में विदेशी शक्ति कौन है ..."
'प्लीज़ ! प्लीज़ ! आप चुप हो जाइए ...नो..नो.. पहले आप...देखिये आप के इस अंश को सदन की कार्यवाही से निकाल दूंगा..."-अध्यक्ष जी अपनी व्यवस्था सुनाई
कमलधारी जी को इस से क्या अंतर पड़ता है की उनके बहस के इस अंश को सदन की कार्यवाही में रखा जा रहा है या निकाला जा रहा है .उन्हें कौन सा अपने क्षेत्र की जनता को पढवाना है .जनता ही कौन सी पढी लिखी है. जो पढ़े लिखे हैं वो चुनाव में वोट देने जाते नहीं . अत: उन्होंने व्यवस्था की परवाह किए बिना अपना वक्तव्य जारी रखा -"... हो सकता है इस में किसी स्वदेशी शक्ति का हाथ हो .इस छींक के पीछे धोती-कुर्ताधारी भाई जी का हाथ हो जो सदन में अभी-अभी खैनी-सुरती बना कर ठोंक रहे थे ..."
" छीकने पर पार्टी ने व्हिप जारी नहीं किया है "- सुरती-खैनी भाई साहब ने आपत्ति जतायी
कमलधारी जी चालू रहे "...यही वह साजिस है जो लोकतंत्र को खोखला बनाती है और यह छींके सदन की गरिमा गिराती हैं "
'प्लीज़ ! प्लीज़ !! आप चुप जाइए . अगर आप चुप नहीं होंगे तो मैं सदन स्थगित कर दूंगा '- अध्यक्ष जी ने कहा --' प्लीज़ देखिये मैं पैर पर खडा हूँ . स्पीकर इज ऑन लेग ."
" वह भी पैरों पर खडा है ...सिर्फ बेंच पर खडा होना बाकी है '- किसी ने चुटकी ली. लोग उचक-उचक कर यह देखने लगे कौन किस के पैर पर खडा है.
'क' जी आप चालू रहे '-अध्यक्ष जी ने कहा
'महोदय ! पहले आप उस कमलधारी के बच्चे को तो चुप कराइए"
"प्लीज़!आप जल्दी-जल्दी चालू रहिये जब आप बोलेंगे तो वह चुप हो जाएगा '
भारतीय लोकतंत्र इस तरह जल्दी जल्दी आगे बढ़ रहा था
'अ' जी ने अयाचित सुझाव दिया -' अरे! काहे का तंत मजाल किए हैं 'क' जी ! छोडिये न ' पुराणो में लिखा है -
एक नाक दो छींक
काम बने सब ठीक
तो मार दीजिये एक छींक आप भी"
अब 'क' जी का मुखारविंद अध्यक्ष महोदय जी की तरफ से हट कर 'अ' जी की तरफ हो गया .गोला उगलते तोप का मुंह घूम गया
'का बात करते है 'अ' जी ? इ तंत मजाल है?यह छींक का प्रश्न नहीं है. हम लोग तो रोजे खैनी-सुरती ठोंकते रहते हैं ...छींक मारते रहते हैं...आज सदन की गरिमा का प्रश्न है ...देश की सौ करोड़ जनता का प्रश्न है /"
अचानक सदन के एक छोर से १०-१५ सदस्य एक साथ उठ खड़े हुए और आपत्तियां उठाने लगे -'क' जी ने अमर्यादित व असंसदीय भाषा का प्रयोग किया है .यह सदन की अवमानना है .देश का अपमान किया है यह हमारे विशेषाधिकार का हनन हुआ है . कुत्ते के बच्चे हो सकते है , ,आदमी के बच्चे हो सकते है मगर कमलधारी के बच्चे नहीं हो सकते ...यह भारतमाता की अस्मिता का प्रश्न है .../भारत माता की जय ..वन्दे मातरम का नारा लगाते हुए सदन की 'वेळ' में आ गए
दूसरे छोर से कुछ तिरंगाधारी ---हाय हाय ! भगवाधारी हाय हाय ! के नारे लगाते हुए सदन के 'वेळ' में आ गए अध्यक्ष जी प्लीज़ प्लीज़ करते करते खड़े हो गए सदन के बाईं तरफ से लाल-झंडे वाले 'साम्प्रदायिक शक्तियां ! धर्म ढोंगियों हाय हाय ! ' के नारे लगाते सदन के 'वेळ' में आ गए.तीसरे कोने से " तिलक त्रिपुंडी हाय हाय ! तिलक तराजू हाय हाय !मनुवादी सब हाय हाय ! के नारे लगाते हुए हाथी छाप वाले भी 'वेल' में आ गए
इसी बीच ,कुछ हाथी छाप वालों ने एक जोरदार नारा उछाला -'तिलक तराजू और तलवार ,इनको मारो जूते चार'....'और सचमुच एक सदस्य ने अति-उत्साही नेता के आह्वान पर जूता चला दिया फिर क्या था ! दूसरे सज्जन ने अपना जूता खोला तो पूरे सदन में दुर्गन्ध फ़ैल गई लोगो ने तुंरत अपने-अपने रुमाल निकाल कर अपने-अपने नाक पर रख लिए .किसी एक सज्जन ने टेबुल से माइक उखाड़ कर प्रक्षेपास्त्र की तरह प्रहार किया .कोई लेज़र गाईडेड मिसाइल तो थी नहीं कि किसी विपक्षी दल के सदस्य कि ही लगती .अत: चूक वश अपने ही दल के सदस्य को जा लगी .वाकयुध्द शुरू हो गया .तुंरत हाईकमान से शिकायत की गई -'यह तो सरासर अनुशासनहीनता है ,निकालिए इसे पार्टी से बाहर .इसी ने मेरे चुनाव क्षेत्र में भीतरघात किया था अब सदन में प्रक्षेपास्त्र प्रहार कर रहा है .इसे निलंबित किया जाए ..." हाईकमान धृतराष्ट्र बने बैठे है .पीड़ित सदस्य को आश्वासन दे रहे हैं -'अभी निलंबन से विश्वासमत गिरने का खतरा है ' दो-चार सदस्य इन दोनों सदस्यों को मनाने-छुडाने में लग गए .
उधेर 'वेल' में धक्कम-धुक्का जारी है .कोई हस्त-प्रहार कर रहा है तो कोई पद प्रहार सब गडम गड .कौन क्या बोल है ? कुएँ में बहुत मेढक हो गए है टर-टर के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है संभवत: विश्वासमत पर जोरदार बहस चल रही है .एक सदस्य ने दूसरे सदस्य को पटकनी दे मारी और उनके सीने पर आसीन हो कर जिज्ञासा शांत कर रहे थे -"...कहता है हम बाहु-बली हैं ..बोल हम बाहुबली हैं?.
संभवत: पहले सदस्य पहलवान थे जो निर्वाचित हो कर सदन में आ गए थे "मैं नहीं मेरी पार्टी कहती है "- नीचे दबे व्यक्ति ने अपना हाथ छुडाते हुए कहा पास खड़े दो-चार सदस्य उत्साह वर्धन कर रहे थे "...उठिए नेता जी ! दीजिये दो -चार धोबिया पाट से ,सारी पहलवानी निकल जायेगी "
इस महायुद्ध से अलग ,दो गांधी टोपीधारी सदन के कोने में भयवश एक बेंच के नीचे छुपे पड़े आपस में कह रहे थे "...गांधी बाबा ने ठीक ही कहा था की इस पार्टी को आजादी के बाद भंग कर देना चाहिए > भईया मेरी पत्नी का टिकट काट दिया था हाईकमान ने . कह रहे थे की आप की पत्नी बूढी हो गई हैं. युवाओं को टिकट देना है . अब दो और युवाओं को टिकट .भुगतो अब नतीजे ....दूसरे गांधीवादी ने अपनी पीडा उड़ेली
उधर धक्कम-धुक्का जारी है .अध्यक्ष महोदय बीच-बीच में प्लीज़ प्लीज़ बोलते जा रहे है .एक सदस्य ने दूसरे सदस्य का कुर्ता फाड़ डाला तो छुपे हुए कई घोटाले प्रगट हो गए .एक ने तो दूसरे की धोती खोलने का प्रयास किया तो वह धोती छोड़ भाग कर अपनी सीट पर जा बैठे .एक महिला सदस्य ने तो पास खड़े एक सदस्य को दांतों से काट लिया .कहते है महिला अपने क्षेत्र की 'विष-कन्या " थी .संयोग अच्छा था कि ज़हर चढा नहीं क्यों की दाँत नकली थे
वैसे इस 'वेल-युद्घ' को तृतीय महायुद्ध तो नहीं कहा जा सकता परन्तु मित्र व अमित्र दल अपने-अपने सदस्यों के साथ नारे लगाते सदन के 'वेल' में आते जा रहे थे . कोई नारा लगा रहा था ' हिंदी वाले हाय ! हाय !' तो तड़ से प्रत्युत्तर में ' उर्दू वाले हाय ! हाय ! ' नारा लगाने लगे
" अरे यार !हिंदी के विरोध में 'तमिल-कन्नड़ ' चलता है उर्दू नहीं. उर्दू तो तब चलेगा जब धर्म का मसला उठेगा.सहयोगियों ने संशोधन प्रस्तावित किया
विश्वासमत पर बहस जारी है .स्पीकर महोदय प्लीज़ प्लीज़ कर रहे है लोकतंत्र आगे बढ़ रहा है जो शरीर से समृद्ध है वो बहस को समृद्ध कर रहे हैं विचारों व तर्क से जो पटकनी नहीं दे पा रहे हैं वो शरीर से पटकनी दे रहे हैं .सदस्यों के कुर्ते फाड़े जा रहे हैं परन्तु लोकतंत्र तार-तार नहीं हो रहा है.टोपिया उछाली जा रही है परन्तु भारत का लोकतंत्र आज भी विश्व में शीर्ष पर है .यही भारत की अनेकता में एकता है.धमा-चौकडी ,शोर-शराबा ,मार-पीट में सभी एक हो जाते है चाहे वह किसी दल,धर्म क्षेत्र,जाति,रंग,के हों.सभी लोग संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकारों का मुक्त कंठ ,मुक्त हस्त ,मुक्त पद,से गाली-वाचन,हस्त-प्रहार व पद-प्रहार कर अपनी पौरुषता व कुरता फाड़ दक्षता का प्रदर्शन कर रहे हैं.समान अवसर प्राप्त है सबको.जनता टी० वी० पर दृश्य देख मगन है .सदन के 'वेल' में जाते हुए नेताओं को यह एहसास नहीं कि सदन के बाहर कि जनता 'वेल(कुँआ) ' में जा रही है
सदन कि दशा व दिशा देख ,अध्यक्ष महोदय ने घबरा कर सभा मध्याह्न काल तक स्थगित कर दी.
०० ००० ००००
भोजनोपरांत सदन कि कार्यवाही पुन: प्रारंभ हुई .सदस्यगण अपने-अपनी सीट ग्रहण कर चुके हैं
" ख' जी आप अपना पक्ष प्रस्तुत करे"-
'ख' जी एक महिला सदस्य थी .सुन्दर थी.जब से राजनीती में अभिनेत्रियों का आना शुरू हो गया है सदन में सौन्दर्य वृद्धि हो गई है जब ये सदस्याएं उठती है तो पूरा सदन बड़े ध्यान से सुनने के बजाय देखने में मगन हो जाता है.जैसे ही उक्त महिला ने अपना वक्तव्य पढ़ना शुरू किया -"...मैं आप का ध्यान अपने पक्ष के दो बिन्दुओं पर आकर्षित करना चाहूंगी..." कि अचानक सदन में हंसी कि लहर दौड़ गई .अब पूरे सदन का ध्यान उनके दो बिदुओं कि तरफ आकर्षित हो गया .स्थिति स्पष्ट होते ही उन्होंने अपना पल्लू खीच लिया और कहा ...'मेरा मंतव्य था...कि ..."
तभी अचानक 'क' जी उठ खड़े हुए और कहने लगे -'अध्यक्ष महोदय ! अभी मेरा भाषण पूरा नहीं हुआ है."
"नहीं,नहीं, आप बैठिये आप का समय पूरा हो गया .आप को पूरा मौका दिया गया "
"यह तो मौलिक अधिकार का हनन है ,लोकतंत्र कि ह्त्या है"
"प्लीज़ आप चुप रहे हाँ 'ख' जी आप चालू रहे "
तभी अचानक सदन में कई सदस्य एक साथ उठ खड़े हुए और समवेत स्वर में बोलना शुरू किए "...महोदय ! अभी छींक पर सदन का फलित विचार शेष है ..."
"प्लीज़ ! प्लीज़ ! आप सब बैठे "
वाही हंगामा पुन: शुरू हो गया
०० ००० ०००
लगता है हमारा लोकतंत्र अभी 'क' 'ख' 'ग' से आगे नहीं बढ़ सका ।

-आनंद

मंगलवार, 2 जून 2009

एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूम ... ....

ट्रिन ! ट्रिन !-टेलीफोन की घंटी बजी 'हेलो !हेलो! ,बड़े साहब हैं?""आप कौन बोल रहे हैं?": आफिस से बड़ा बाबू बोल रहा हूँ "" तो थोडी देर बाद फोन कीजिएगा ,साहब बाथरूम में है " बड़ा बाबू का माथा ठनका रामदीन तो कह रहा था की साहब आज घर पर ही है तो वह बाथरूम में कब घुस गए हूँ ! साहब लोगों के बाथरूम भी क्या चीज़ होती होगी होती होगी कोई चीज़ मस्त-मस्त हमें क्या! 'बाथरूम' का यदि शब्दश: हिंदी रूपान्तर किया जाय तो अर्थ होता है -'स्नान-घर' परन्तु जो बात अंग्रेजी के 'बाथरूम' में होता है वह हिंदी के 'स्नान-घर में नहीं "बाथरूम" शब्द से एक अभिजात्य वर्ग का बोध होता है -टाइल्स लगी हुई दीवार ,मैचिंग करते हुए बेसिन ,शीशे- सी चमकती हुई फर्श ,हलकी-हलकी फैली हुई गुलाब की खुशबू की जो कल्पना 'बाथरूम ' से उभरती है वह चिथड़े गंदे टंगे परदे हिंदी के स्नान-घर से नहीं।ज्ञातव्य है की साहब लोगों के बाथरूम में मात्र स्नान कर्म ही नहीं होता अपितु 'नित्य-कर्म' का निपटान भी होता है. जन साधारण के लिए 'साहब बाथरूम में है " का सामान्य अर्थ होता है कि साहब 'दैनिक-निपटान-क्रिया ' में व्यस्त हैं. उस दिन श्रीमती जी एक सहेली आई थीं .गोद में ६ महीने का एक बच्चा भी था.थीं तो 'भृगु-क्षेत्र' (बलिया) की परन्तु जब से रांची आई है इधर दो-चार अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना सीख रही हैं.वह अंग्रेजी भी भोजपुरी शैली में बोलती हैं उदाहरणत: -'जानती हैं भाभी जी इस्कूल-उस्कूल में पढाई-लिखाई नहीं होती हैं न ,गौरमिंट के इम्प्लाई है सब टीउशनवे में मन लगता है उस दिन सोफे पर बच्चे ने सू-सू कर दिया ,बेचारी सकुचा गई '....लो लो लो राजा बाबा ने सोफे पर "बाथरूम' कर दिया ना॥ना..ना.. तब मुझे बाथरूम शब्द का एक और व्यापक अर्थ मिला सत्य भी है- शब्द वही जो श्रोता को अपना अभीष्ट अर्थ सम्यक प्रेषित करे एक घंटे पश्चात ,बड़े बाबू ने पुन: फोन किया /घंटी बजी ,किसी ने टेलेफोन उठाया बोला-'अरे! कह दिया न साहब बाथरूम में है ' थोडी देर बाद टेलीफोन कीजिएगा ...'बड़े बाबू सोचने लगे कि यह साहब लोग भी क्या चीज़ होते है ,हमेशा बाथरूम में ही बैठे रहते हैं 'बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया सत्य भी है बड़े बाबू को साहब लोगो के बाथरूम कि कल्पना भी नहीं होगी .होती भी कैसे? गाँव-गिरांव में ऐसे बाथरूम तो होते नहीं.उस कार्य के लिए वहां खेत है ,मैदान है .नीचे खुली ज़मीन है ऊपर आसमान है और शहर में? एक अदद सरकारी क्वार्टर है जिसमे मात्र एक बाथरूम है बाथरूम भी इतना छोटा कि मात्र 5 मिनट में दम घुटने लगता है .अत: जल्दी बाहर आ जाते है दियासलाई का डिब्बा भी उनके बाथरूम से बड़ा होता है. बकौल बशीर साहेब :-'पाँव फैलाऊं तो दीवार से सर लगता है' यही कारण है कि छोटे कर्मचारी बाथरूम में कम ही पाए जाते है. यह बात अन्य है कि उचित रख-रखाव व अनुरक्षण के अभाव में पूरा का पूरा कमरा ही बाथरूम नज़र आता है मगर साहब लोगो का बाथरूम ? जितना बड़ा साहब उतना बड़ा बाथरूम .अगर श्रेणी चार का आवास है तो २ बाथरूम ,श्रेणी 5 का आवास है तो ३ बाथरूम .अगर निजी आवास है तो कई बाथरूम .हो सकता है कई कमरें में संलग्न बाथरूम हो.जितने बाथरूम होते है उतनी ही दुर्गन्ध फैलती है .ऐसे ही लोग समाज में ज्यादा गंध फैलाते है.कभी यह घोटाला ,कभी वह घोटाला.पास बैठेंगे तो विचारों से भी दुर्गन्ध आती है.फिर बड़ी शान से बताते हैं कि कैसे वह 'रिंद के रिंद रहे सुबह को तौबा कर ली 'क्या बिगाड़ पाई सी०बी०आइ० ,कोर्ट-कचहरी या व्यवस्था ?सूना है हिरोइनों के बाथरूम काफी बड़े व महंगे होते है.लाखो रुपये कि तो इतालियन मार्बल ही लगी रहती है चाहे तो आप अपना चेहरा भी देख सकते हैं बशर्ते कि काले धन से आप का चेहरा काला न हो गया हो एक बार पढ़ा था कि अमुक हिरोइन के बाथरूम के जीर्णोध्दार मात्र में उस ज़माने में १० लाख का खर्च आया था .अब यह बात डिब्बी वाले बाथरूम के बड़ा बाबू क्या समझेंगे !वर्मा जी ने अपना बाथरूम बहुत बड़ा बनवाया था .आयकर विभाग में अधिकारी थे .उन्होंने संगमरमरी फर्श के अतिरिक्त काफी साज-ओ-सामान लगवा रखा था .गर्म पानी केलिए गीजर, ठंडे पानी के लिए फ्रिज ,केबुल टी०वी० ,एक बुक-स्टैंड ,कुछ पत्रिकाएँ ,कुछ किताबें ,एक कोने में एक सोफा भी डाल रखा था सुबह ही सुबह अपना मोबाईल फोन व समाचार पत्र लेकर बाथरूम में जो घुसते तो दो घंटे बाद ही निकलते .समाचार भी पढ़ते तो पत्र का नाम -पता-अंक-वर्ष- प्रकाशन संस्करण से लेकर प्रकाशक-मुद्रक तक पढ़ डालते थे एक अधिकारी थे शर्मा जी . किसी राज्य स्तरीय घोटाले में लिप्त थे .सोचते थे मेरे घोटाले से वर्मा का घोटाला ज्यादा सफ़ेद क्यों.? मेरे बाथरूम से वर्मा का बाथरूम बड़ा क्यों? क्यों वर्मा ने बाथरूम में केबुल टी०वी० फ्रिज टेलीफोन लगा रखा है ? स्साले का बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया अत: शर्मा जी ने 'बाथरूम ' को बड़ा करने के बजाय बाथरूम को ही अपने ड्राइंग रूम में लेते आये.अब उनका दीवान भी समंजित हो गया .आत्म-तुष्टि हो गई .उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह पहले से ज्यादा स्पष्ट नंगा नज़र आने लगे.पूछने पर कहते हैं '...हमने तो छुप-छुपा कर ही घोटाला किया था परन्तु यह सी०बी०आइ० वालों ने नंगा कर दिया .अब बचा ही क्या है छुपाने के लिए ? और बाथरूम में तो यूँ ही सब नंगे होते है .मेरा ड्राइंग रूम ही मेरा बाथरूम है.कितना बड़ा है मेरा बाथरूम ...." और उन्हें मन ही मन अपने बड़े होने का एहसास होने लगा शायद इसी कारण उनकी सोच ,उनके विचारों में दूषित गंध है उन्हें पता नहीं है.वह स्वस्थ समाज की सुगन्धित हवाओं से परिचित क्यों नहीं हैं.वह अपनी दुर्गन्ध को ही सुगंध मानते हैं.सूअरों को गन्दगी का एहसास नहीं होता .शायद ऐसे ही जगहों पर लोट-पोट कर आनंद प्राप्त होता है.ऐसे लोगो का आतंरिक सौन्दर्य बोध व चेतना मर जाती है.फिर वह बाथरूम के भीतर नंगे हों या बाहर नंगे हो ,अंतर नहीं पड़तासाहब लोग बाथरूम में करते क्या है? बाथरूम में सभी 'दैनिक-क्रिया' का निपटान ही करते हैं /किसी को यह 'निपटान 'जल्दी हो जाता है किसी को विलंब से बड़ा साहब है तो बडा समय लगेगा. गरीबो को तो खाने के ही लाले पड़े रहते है क्या खाए ?,क्या निकाले ?आफिस के बाबू किरानी को तो साग-सब्जी पर ही संतोष करना पड़ता है .पेट में कुछ है ही नहीं तो खायेगा क्या निकालेगा क्या. अत: 5 मिनट में ही निवृत हो कर बाहर आ जाता है और बड़ा साहब ! बड़ा साहब-बड़ा पेट वह खाता है मांस-मछली,मुर्ग-मुस्सलम ,चिली-चिकेन,चिकेन-बिरयानी,.... वह पीता है बीयर,व्हिस्की अगर इस से भी तुष्टि नहीं मिलती तो खाता है चारा ,अलकतरा ,शेयर तोप,पनडुब्बी ,टेलीफोन यूंरिया ,.. इस से भी आगे खाता है गरीबो के मुंह का निवाला ,सड़क,मकान,पुल के ठेके .दूकान के ठेके ,अगर मौका मिला तो आदमी को भी कच्चा खा सकता है ....जब पेट में इतने गरिष्ठ भोजन हो तो कब्जियत की शिकायत होगी ही.विचारों में गरिष्टता छायेगी ही. फिर फिर 'बाथरूम में कौन सी पची-अनपची चीज़ पहले बाहर निकले स्पष्ट नहीं हो पाता फिर हो जाता है बवासीर...निकलता है खून जो गरीबो का पीया होता है.'ट्रिन ! ट्रिन !! ट्रिन !!! '- बड़े बाबू ने फोन किया ---'साहब है ?' नहीं, साहब बाथरूम में है

'अस्तु
---आनंद

रविवार, 31 मई 2009

एक व्यंग: सुदामा फिर आइहौ....

एक व्यंग: सुदामा फिर आइहौ....

सुदामा की पत्नी ने अपनी व्यथा कही ....
' हे प्राण नाथ ! या घर ते कबहूँ न बाहर गयो,यह पुरातन फ्रीज़ और श्वेत-श्याम टी०वी० अजहूँ ना बदली जा सकी.पड़ोस की गोपिकाएं कहती हैं 'हे सखी! आज-कल आप के बाल-सखा श्रीकृष्ण का राज दरबार दिल्ली में है.आप दिल्ली में द्वारिका की यात्रा क्यों नहीं करते? क्यों नहीं मिल आते एक बार ? कम से यह कष्ट तो कट जाते प्राणनाथ!
'हे प्राणेश्वरी !कितने वर्ष बीत गए. अब कौन पहचानेगा मुझे? बचपन की बात और थी जब हम साथ-साथ गौएँ चराया करते थे और वह चैन की वंशी बजाया करते थे .उनकी बात और है .वह भाग्य के प्रबल हैं.पूर्व में गोपिकाओं से घिरे रहते थे अब सेविकाओं से. हे स्वामिनी! मुझे आवश्यकता नहीं है 'दिल्ली' यात्रा की. हम संतुष्ट हैं अपने पुरातन फ्रिज व श्वेत-श्याम टी ०वी० से .क्या हुआ? फ्रिज में पानी ठंडा होता तो है.टीवी में 'चित्रहार' रंगोली आती तो है .चित्र हिलता है तो क्या?गाता तो है. अरे बावरी !औरों को गाडी बँगला टेंडर चाहिए ,हम निर्धन ब्राह्मण लिपिकों को लिफाफा बंद दान-दक्षिणा ही पर्याप्त है "-सुदामा ने कहा
कहते हैं सुन्दर स्त्रियों के अमोघ अस्त्र होते है उनके आंसू. एक बार निकले तो उसकी उषणता से पुरुष पिघल जाता है और यदा-कदा चुल्लू भर आंसू में डूब भी जाता है .सब अस्त्र चूक सकते है ,पर यह नहीं.पति नामक निरीह प्राणी फिर समर्पण कर देता है .यही इसका रहस्य है.अंततोगत्वा सुदामा जी को एक आदर्श पति की भांति,पत्नी की बात माननी पड़ी. इच्छा न होते हुए भी 'दिल्ली' में द्वारिका की यात्रा करनी पडी सुदामा की पत्नी एक सुयोग्य व विदुषी महिला थी /यात्रा -पथ के लिए उन्होंने पूडी-सब्जी , मिस्थान के अतिरिक्त एक पोटली और तैयार की विशेष रूप से श्री कृष्ण के द्वारपाल को भेंट देने के लिए चल पड़े सुदामा
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'ऐ ठहरो ! कौन हो तुम? किससे काम है?-द्वारपाल ने बन्दूक की बट टोंकते हुए कड़कती आवाज़ में कहा
''भइए मैं ,मैं हूँ सुदामा.,श्री कृष्ण ले बाल-सखा मित्र से मिलना है "
" मिलना है? हूँ !"- द्वारपाल ने एक व्यंगात्मक व परिहासजन्य कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा -' मिलाना है? अरे ! अपना रूप देखा है?
साहब के बाल-सखा है ! चला आया मिलने ! हूँ ,अप्वांतमेंट लिया है?"-द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की.
"ई अपैंत्मेंट का होत है भैया ? हम ठहरे बाल-सखा बाल-सखा सुदामा गोकुल में साथ-साथ गौएँ चराया करते थे "
" तो जाकर चराओ न , इधर काहे वास्ते माथा खाता है तुम्हारे जैसा दर्ज़नों सुदामा आता है इधर साहब का मिलने वास्ते . साहब तुम जैसे चरवाहों से मिलना शुरू कर देगा कल वह भी उधर गौएँ चराता नज़र आएगा. चलो हटो ! अपना काम करो शीश पगा न झगा तन पे "-द्वारपाल ने सुदामा को परे धकेलते हुए कहा
दीन दुखी सुदामा धकियाये जाने के बाद ,बाहर सीढियों पे बैठ गए.सुदामा जो ठहरे ब्राहमण आदमी ,स्वभावगत भीरू व निश्छल आज तक लाठी-पैना के अतिरिक्त कोई अस्त्र-शस्त्र तो देखा नहीं था ,बन्दूक मशीनगन देख वैसे ही पसीना छूटने लगा मन ही मन कभी स्वयं को ,कभी पत्नी को कोसने लगे.अच्छा-भला ,शान्ति पूर्वक जीवन यापन कर रहा था ,व्यर्थ में फंसा दिया इस माया जाल में .श्वेत-श्याम टी 0 वी० ?अरे नहीं बदलता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ? और एक यह द्वारपाल का बच्चा कि खडा है द्वार पर पहाड़ की तरह .प्रवेश की अनुमति ही नहीं दे रहा है .इसीलिए कहते हैं की स्त्रियों की बात कदापि नहीं माननी चाहिए.साथ ही यदि वह स्त्री चतुर हो तो भूलवश भी नहीं .कहती थी यह पोटली दे दीजियेगा द्वारपाल को.हूँ ! यहाँ गाडी-मोटर वाले को तो कोई पूछता नहीं तो यह पोटली कौन सा तीर मार लेगी.? सुदामा जी ने कुछ साहस बटोर कर एक बार पुन: प्रयास किया .
" भइए ! अपैंतमेंट तो नहीं लाया है ,यह पोटली लाया हूँ तुम्हारे लिए,तुम्हारी भाभी ने दी है."
द्वारपाल ने ,कक्ष के कोने में जाकर पोटली का थोडा मुख खोला पूर्ण मुख खोलने से आचार-संहिता के उल्लंघन की संभावना थी कर्तव्यनिष्ठा पर आंच आ सकती थी पोटली के भीतर कागज़ के कुछ हरे-हरे व कड़े-कड़े दुकडे नज़र आये. द्वारपाल की आँखों में एक विशेष चमक व चहरे पर एक संतोष भाव उभर आया.
जब वह अपने आस-पास देख ,पूर्ण रूप से आश्वस्त हो गया की यह सुखद क्रिया किसी अन्य आगंतुक ने नहीं देखी तो झट पोटली बंद कर अपने पास रख ली.फिर मुड़ कर वाणी में मिठास घोलते हुए कहा -" तो भईए सुदामा ! दिल्ली नगरी कब पहुँचे? रास्ता में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?
सुदामा जी स्तब्ध व अचम्भित हो गए. अभी अभी यह करेला नीम चढा था 'रसगुल्ला कैसे बन गया? बिनौला था रसीला कैसे हो गया ?
सुदामा जी ब्राह्मण ठहरे ,द्रवीभूत हो गए.'भईया' कितना प्यारा सम्बोधन दिया है.अपनापन उभर आया होगा . काश! धर्मपत्नी की बात मान पहले ही यह पोटली भेंट कर दी होती. परन्तु क्या था उस पोटली में की वाणी में मिठास आ गयी ? अवश्य ही नए गुड की डली रही होगी.पत्नी ने हमी से छुपाई थी यह बात . हो सकता है द्वारपाल महोदय पिघल गए होंगे . हमने भी तो भाभी का रिश्ता देकर सौंपी थी. पोटली आहा ! क्या द्वापर युग है .भेंट-दक्षिणा 'द्वार पर 'से ही शुरू.
सुदामा जी को मालूम नहीं ,कौन सी 'विलक्षण' वास्तु उस पोटली में हमें ज्ञात नहीं.यह रहस्य मात्र दो व्यक्ति जानते थे -एक द्वारपाल और दूसरे सुदामा की पत्नी.
उक्त पोटली के प्रभाव से सुदामा जी अन्दर पहुँच गए.
अन्दर ,श्रीकृष्ण जी ,मसनद के सहारे ,केहुँनी टिकाए लेते हुए हैं.अब मोर -मुकुट पीताम्बर की जगह खद्दर का कुरता,पायजामा ,जवाहर जैकेट , गांधी-टोपी है.अब छछिया भरी छाछ पे नहीं नाचते हैं ,अपितु कोटा-लाइसेंस के लिए अपने भक्तों को नचाते हैं .माखन की गगरी में नहीं ,वोट की नगरी में सेंध लगाते है.फल-फूल रखा है,अधिकारी ,व्यापारी,दरबारी घेरे खड़े हैं.कई सुदामा अपनी-अपनी झोली फैलाए खड़े है.किसी को तबादला करवाना है,किसी को तबादला रुकवाना है.किसी को परमिट चाहिए ,किसी को कोटा,बड़े लडके को मेडिकल में एड्मिसन दिलाना है.साहब एक संस्तुति -पत्र लिख दें तो कार्य सिद्ध हो जाएगा.भीतर चकाचौंध है.कुछ झोलाधारी,कुछ चश्माधारी .कुछ दाढ़ी बढाए ,कुछ मुंह लटकाए.कुछ स्वस्तिवाचन करते .कुछ स्तुतिगान करते.खड़े है
" सर ! आप तो जानते हैं कि कितने वर्ष से इस पार्टी कि निस्वार्थ सेवा कर रहा हूँ सर! एक गैस एजेन्सी मिल जाती तो ..... टेलीफोन कि घंटियाँ बज रही है टेलीफोन आ रहा है....टेलीफोन जा रहा है.......'हेलो हेलो ...मैं मंत्री निवास से बोल रहा हूँ ...हेलो हेलो आप सुन रहे हैं ना ....साहब की इच्छा है ......साहब चाहतें हैं .....आप सुन रहे हैं ना....साहब ने पूछा है....साहब कह रहें हैं.....साहब माँगते है......अच्छा ऐसा कर दीजिएगा ....नहीं नहीं ....लगता है...आप सुन नहीं रहे हैं.....टिकना मुश्किल हो जाएगा आप का ......आप दिल्ली आकर मिलिए ...
दरबार चल रहा है.चर्चा चल रही है देश की..विदेश की . 'गोकुल' की नहीं "अयोध्या' की .'मथुरा ' की नहीं 'राम-जन्म भूमि' की. 'राधा' की नहीं 'छमिया ' की.ग्वाल-बाल की नहीं 'मंडल 'की वैसे साहब का अपना 'बरसाना ' भी है
एक कोने में 'सुदामा जी' निरीह व निस्वार्थ भाव से औचक खड़े है. आज के कृष्ण सुदामा को नहीं पहचानते.अब दौड़ कर नहीं आते.बहुत सुदामा पैदा हो गए हैं.तब से अबतक .दिल्ली में सुदामा का पहचानना आवश्यक भी नहीं .पांच साल में मात्र एक बार तो पहचानना है ,जा कर पहचान लेंगे निर्वाचन क्षेत्र में पखार लेंगे पाँव एक बार
सुदामा जी के मुख पर संकोच का भाव है .यहाँ लोग कितने मिस्थान के पैकेट लाएं है और एक मैं कि कुछ नहीं लाया एक पोटली लाया भी था तो उस द्वारपाल के बच्चे ने रख लिया .विगत पचास-साठ साल से दिल्ली के किसी कोने में भारत का सुदामा आज भी खडा है ,अपने श्रीकृष्ण से मिलने के लिए .आज भी सुदामा दीन-हीन निरुपाय है आज भी " शीश पगा न झगा तनte पे 'है
साहब उठ गए.दरबार ख़त्म हो गया अन्य लोग भी उठ कर जाने लगे.साहब को किसी जन सभा में जाना है .भाषण देना है भारत कि दीन-हीन गरीबी पर.उनकी झोपडी पर जहाँ विकाश का रथ अभी तक नहीं पहुंचा है.उन गरीब भाइयों पर जहाँ अँधेरा है.भीड़ चल रही है .एक युवा तुर्क व्यक्ति आगे-आगे रास्ता बनाते चल रहा है ...'हटिये हटिये ...जरा बाएँ हो जाएँ...भाई साहब ...भीड़ मत लगाइए ..अभी साहब को जाना है..'- भीड़ छंट कर अगल-बगल हो जाती है कि अचानक साहब कि दृष्टि सुदामा पर पड़ती है
'अरे सुदामा! ? कब आए?'
'दर्शन करने आ गया सखे !'- वाणी में विह्वलता व ह्रदय में प्रेम भर कर सुदामा ने कहा
' ओ० के० ओ० के० फिर मिलना '
भीड़ सुदामा को पीछे धकेलते आगे बढ़ जाती है
०० ००० ००००
सुदामा का भ्रम टूट गया.सखापन वाष्प बन कर उड़ गया .मन भारी हो गया.अंतर्मन आर्तनाद से भर उठा.गला रुंध गया आँखों में प्रेम के आंसू छलछला गए.
धीरे -धीरे बोझिल कदमों से बाहर आ गए
' भैये भेंट हो गयी अपने बाल-सखा से ?--द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की
सुदामा बंगले की सीढियां उतरते सड़क पर आ गए
" फिर आईहौ लला ! पोटली लाना न भूलिअहौ"- द्वारपाल ने आवाज़ लगाईं
अस्तु!

----आनंद