रविवार, 21 जुलाई 2013

व्यंग्य: एक गीत का पोस्टमार्टम...[क़िस्त-2]

गतांक से आगे.... [...पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि किस तरह युवाओं की आग्रह पर सरकार ने ’बम्बईया फ़िलिम’ को एक ऎच्छिक विषय के तौर पर अनुमति दे दी और कैसे हमारे शिक्षकों ने उस विषय पर पढ़ाना शुरु कर दिया ...कैसे ’गेस-पेपर’ छापे जाने लगे..कैसे हमारे शिक्षाविदों ने कोर्स में घुसने के लिए ’जुगत’ भिड़ाने लगे और कैसे ’सर’ इम्पार्टेन्ट क्वेश्चन’ बता बता कर परीक्षा की तैयारी कराने लगे.....। अब आगे पढिए.....] परीक्षा की घड़ी आ गई । सर ने समझाया था कि परीक्षा -कक्ष में घबड़ाना नहीं ,अपने इष्ट हीरो-हिरोईन को स्मरण करना ,अवश्य मदद करेंगे। कई निर्देशको व फ़ाईनेन्सरों का करते हैं। लिखना ,धुंआधार लिखना ,मगर लिखना ज़रूर।मूलोनास्ति कुतो शाखा ??लिखोगे नहीं तो नम्बर कहां से मिलेगा?कुछ कुछ परीक्षक तो मात्र पन्ने गिन कर अंक प्रदान करते हैं। प्रश्न-पत्र मिला तो आंखों के सामने अँधेरा छा गया।प्रथम प्रश्न था-अरे! यह क्या प्रश्न है? यह तो पाठ्यक्रम के बाहर का प्रश्न है।हम इसका बहिष्कार करेंगे?कहाँ तो हम प्रात: स्मरणीया ’प्रीटि ज़िन्टा’ जी का जीवन परिचय रट कर आये थे -क्या खातीं है...क्या पहनती हैं.कैसे चलती हैं...उन्हें क्या क्या पसन्द है....आजकल उनका किससे टांका..उस फ़िल्म की शूटिंग बीच में छोड़ कर क्यों चली गईं थी...फिर निर्माता ने एड्वान्स दिया तो कैसे मान गईं...। मगर इस खूँसट पेपर-सेटर साले को इतनी अच्छी अच्छी सुमुखी जिन्स धारिणी अभिनेत्रियों को छोड़ कर गिनती रटने की क्या ज़रूरत थी।अरे! यही गिनती पहाड़ा रटना होता तो हम ’मैथ’ विषय न ले लिए होते। साइन्टिस्ट इंजीनियर न बने होते! हाल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है।लगता है फ़िल्में तो सभी ने देखी होंगी मगर उस फ़िल्म के साहित्यिक ,सामाजिक ,राजनैतिक,आर्थिक तकनीकि पहलुओं पर ध्यान न दिया होगा।मात्र हीरो-हिरोईन के लटके-झटके में या फिर हीरो-विलेन के ढिशुंग-ढिशुंग में ही 3-घण्टे गँवा दिए।अब इस परीक्षा में गंवाने पड़ेंगे। मेरा चिट-भंडार किसी ठंडे बारूद की तरह निष्क्रिय हो गया ।लगता है अब पास वाले मित्र या परीक्षार्थी से मदद याचना करनी पड़ेगी। -"अरे बंटी ! यह कौन सा प्रश्न है यार !।एक-दो-तीन-चार? -"आगे चार-पाँच-छह सात भी लिखा है क्या" -अरे हां !हाँ ! तू जानता है क्या? -उसके आगे 9-2-11 भी लिखा है क्या? अरे! यार ,यह तो गाना है ’फ़िलिम’ का ।क्या राप्चिक गाना था ..मस्त...मज़ा आ गया था फ़िलिम देख कर..क्या मस्त हिरोईन थी....वाऊ.."-बंटी जी खड़े हो गये नाचने के लिए। आवेश के क्षणों में भूल गये यह सड़क नहीं ,परीक्षा-कक्ष है।यह तो अच्छा हुआ कि उन्होने एक-दो ठुमका नहीं लगाया अन्यथा पूरा परीक्षा-कक्ष ही ठुमका लगाने लगता। "अरे ! वो गाना !..." अब मेरे हॄदय में भी विश्वास का संचार होने लगा। हम भी कहें कि फ़िल्मी-कोर्स की परीक्षा में यह गणित का प्रश्न-पत्र कहाँ से आ गया?? "साइलेन्स प्लीज़-कृपया शान्त रहें"- कक्ष-निरीक्षक नें ऊँघते-उँघते हुए वहीं से आवाज़ लगाई।कक्ष में फिर एक ्बार सन्नाटा फ़ैल गया और मैं उत्तर लिखने में व्यस्त हो गया। प्रथमत: मैं चक्षु बन्द कर ध्यान-योग मुद्रा में उस फ़िल्म का ’डान्स-स्वीकेन्स’ याद करने लगा। गुरू जी ने कहा था -वत्स !संकट की घड़ी में घबड़ाना नहीं ....अपने इष्ट हीरो-हिरोईनों का स्मरण करना- अनिल कपूर ...माधुरी दीक्षित.जी...फिर वह गाना...फिर नाचना ---फिर गाना...फिर छेड़-छाड़--फिर...फिर...सब कुछ आंखों के सामने एक एक कर के दृश्य आने लगे किसी चल् चित्र की तरह..। 1 -2 -3 -4- 5- 6 -7- 8 -9 -10 --11 -12 -13 [एक दो तीन चार पाँच छै सात आठ नौ दस ग्यारा बारा तेरा तेरा करूँ गिन गिन के मैं इन्तज़ार ,आजा सनम आई बहार] पर्दे पर यह गीत कई बार देख चुका हूँ मगर आज तक मैं यही समझता था कि श्रीमान हीरों जी सुश्री हिरोईन जी को गणित सिखा रहा है -नाच गा कर। काश ! कि हमारे ज़माने में गुरु जी या मैडम जी ने मुझे भी ऐसे से ही गणित पढ़ाई होती तो ’मैथ’ में मैं 3 बार फ़ेल न हुआ होता और आज यह कलम घिसाई न कर रहा होता। परन्तु आज यह महसूस हुआ कि इस महान गीत की आत्मा को न समझ सका। इसके साहित्यिक या सामाजिक ,[संभवत: आर्थिक भी] पहलू न पहचान सका।छोटा आदमी हूँ बड़ा कुछ सोच न सका।महान गीतकारों की रचनायें महान होती हैं ।उनको समझने के लिए उर्वरा मस्तिष्क होना चाहिए ।यही कारण है कि जब महान कवि काव्य-पाठ करते हैं तो श्रोता गण ’हूट’ कर देते हैं लेकिन जब मस्तराम आवारा ’मस्त’ जी अपनी कविता सुनाते है तो श्रोता तालियां बजाते हैं ।वैसे तालियां मेरे भी कविता पाठ पर भी नहीं बजती। ऊपर वाले गाने की व्याख्या सुन कर मेरा दिव्य-ज्ञान जग गया। मेरे अन्तर्नेत्र खुल गये।सर जी इस गाने के ’यथार्थवाद ’ में ही उलझ कर रह गये ।’रहस्यवाद’ नहीं पकड़ा ,मैने पकड़ लिया। इस गीत के माध्यम से कवि कहना चाहता है.... ’हे मूढ़ श्रोता ! मन्दबुद्धि !’एक’ का अर्थ भगवान से है । भगवान 1-है तुम उसे अल्लाह कहो ..राम कहो..यीशु कहो..-सब एक हैं।यहाँ ’एक’ शब्द का प्रयोग सर्वधर्म समभाव व धार्मिक सहिष्णुता के रूप में किया गया है-सबका मालिक एक है।यह एक असम्प्रदायिक परिभाषा है।यही अद्वैतवाद है।परन्तु कवि ने इसका प्रयोग ’फिल्म’ में हीरोईन महोदया के लिए किया है -हे सुमुखी !चैन हारिणी! तुम चांद की तरह ’एक’ हो जिसके इर्द-गिर्द हीरो-डाइरेक्टर प्रोड्यूसर तथा मेरे जैसे लगुये-भगुये कीड़े-मकोड़े ’फ़ैन’ निश दिन चक्कर काटते रहते हैं। और ’दो" शब्द का प्रयोग? यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग दो रूप में क्या गया है।आप इसे ’द्वैतवाद’ के रूप में भी समझ सकते हैं।जैसे बिना ’द्वैतवाद’ का जीवन दर्शन पूर्ण नहीं हो सकता वैसे ही बिना २-पात्रों -हीरो और हीरोईन के बिना कोई फ़िल्म पूर्ण नहीं हो सकती। ’अद्वैत वाद ’ से मात्र ’समान्तर सिनेमा’ ही बन सकता है जो फ़िल्म के ’मोक्ष’[फ़्लाप] की गारन्टी है। हिन्दी मास में २-पक्ष होते हैं-शुक्ल पक्ष एवं कॄष्ण पक्ष । कवि कहना चाहता है हे सुमुखी ! हे हीरोईन कूल्हा-मटकावनी मल्लिका -तुम्हारी केश राशि कॄष्ण पक्ष की तरह काले और मुख शुक्ल पक्ष की तरह गौर वर्ण अर्थात गोरा है ।अत: हे...... और तीन ? तीन शब्द का प्रयोग कवि ने बहुत सोच विचार कर किया है। वह एक रहस्य है.। यह भगवान ’शंकर’ के त्रि-नेत्र की तरफ़ इंगित करता है कि जब हीरो शान्त भाव से ,हीरोईन के ध्यान में ध्यानस्थ रहता है तो सर्वत्र शान्ति बनी रहती है।ऐसा प्राय: फ़िल्म के ’इन्टर्वल’[मध्यान्तर] तक रहता है तत्पश्चात जब हीरो अपना ’त्रिनेत्र’ खोलता है तो मुहल्ले के सारे गुण्डे-मवाली-टपोरी और कभी कभी हीरोईन का बाप भी भस्म हो जाता है।सारी बुराईयां खत्म हो जाती है। ’विलेन’ जेल चला जाता है और फिर सर्वत्र ओम शान्ति ओम छा जाती है और चार? महीने में चार हफ़्ते होते हैं।यहाँ पर यह ’चार’ -विलेन जी के ’हफ़्ता’ वसूलने को इंगित करता है।यही लक्षणा है ,यही व्यंजना है।यही इस कविता का सौन्दर्य भी है । ’पाँच’ के बारे में आप को क्या बताना ! तुलसी दास जी पहले ही बता गये हैं क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच तत्व मिल बना शरीरा हीरो कहता है -हे विलेन की विधवा ! तू शोक न कर। मैने उसको गोली मार कर ’पंचतत्व में विलीन कर दिया है ।मेरे हाथों उसका मोक्ष हो गया है। परिक्षक भ्रम में न रहें। यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग इस सन्दर्भ में नहीं किया है । एक कवि ,एक गीतकार जब फ़िल्मी गीत लिखता है तो बहुत कुछ देखना पड़ता है उसे -सिवा अपनी कल्पनाशीलता के- सिचुएशन देखना पड़ता है -हीरो का ध्यान रखना पड़ता है हीरोईन का ख्याल रखना पड़ता है । मल्लिका शेरावत से निरुपाराय जी के गीत तो नहीं गवा सकते न।फिर डाइरेक्टर -प्रोड्युसर जी का भी ,अपने पेमेन्ट की संभावनाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है-सिवा अपने गीत के भाव के। गीत का भाव क्या? जैसा पैसा वैसा भाव।यहां पर गीतकार ’पाँच’ शब्द के प्रयोग कर यह संकेत देना चाहता है कि हे प्रोड्युसर भईया ! अगर यह गाना ’हिट’ हो गया तो तेरी ’पाँचों’-ऊगलियाँ घी में होगी।न शोचयन्ति अर्हसि’- और छ:? [व्यंग्य जारी है......] आनन्द.पाठक 09413395592

रविवार, 14 जुलाई 2013

एक व्यंग्य: पोस्टमार्टम एक गीत का...[क़िस्त १]

[और वो गीत है १....२...३...४..५..६..७...८..९..१०..११..१२..बारा तेरा] जब से ’शोले’ फ़िल्म ’न भूतो ,न भविष्यति’ पद को प्राप्त हुई है तब से कई फ़िल्मकार इस पद पर पुनर्स्थापना हेतु निरन्तर प्रयासरत हैं। जिसे देखो वही ’शोले’ फ़िल्म का ’रिमेक’ बना रहा है । ्तेलगु से लेकर हिन्दी तक ,मलयालम से लेकर भोजपुरी तक।हर कोई चाहता है कि उसे ’गब्बर सिंह’ वाली भूमिका मिले। अब ’बाबी डार्लिंग ही बच गईं है । हर कोई ’गब्बर सिंह’ की तरह संवाद अदायगी कर रहा है- कितने आदमी थे? आयं ! लगा तो निशाना इस हरामजादे पर। हा! हा ! हा! यह भी बच गया स्साला ! लगता है आने वाली पीढ़ी ’गाँधी’ जी के विचार भूल जायेगी मगर ’गब्बर जी’ के डायलाग नहीं भूल पायेगी।इसी उत्साह से अति प्रभावित होकर हमारे युवाओं ने माँग रख दी -बहुत पढ़ चुके हम ’सूर’ कबीर’ तुलसी’। सूर सूर तुलसी शशि।अब समय आ गया है नये युग के साथ चलने का । कुछ नई सोच का।हमारा मानना है कि हमारे हिन्दी के अति कठिन पाठ्यक्रमों में’बम्बईया फ़िलिम’ का भी एक पाठ्यक्रम शामिल किया जाय।इससे हिन्दी को एक नया बल मिलेगा ,एक नई दिशा मिलेगी,एक नया सोच मिलेगा। हमें फ़िलिम देखने का औचित्य मिलेगा। गुरु जी को विदेश जाने का आधार मिलेगा। देखने को तो हम फ़िल्में अब भी देखते हैं परन्तु इसका पठन-पाठन में कहीं उपयोग नहीं हो पा रहा है । यदि यह विषय पाठ्य क्रम में समाहित हो जाय तो कम से कम एक विषय में तो अच्छे नम्बर से पास हो जाते ।परन्तु सरकार है कि सुनती ही नहीं।लगता है कि अपुन का अब दादागिरी के बजाय ’गांधीगिरी’ करना पड़ेगा। आन्दोलन करना पड़ेगा..रास्ता जाम करना पड़ेगा..2-4 गाड़ियां फूँकनी पड़ेगी...भूख हड़ताल करनी पड़ेगी..आमरण अनशन करना पड़ेगा....युवाओं ने सोचा। हमारे युवा हमारे भविष्य हैं ।यही सोच कर सरकार ने प्रायोगिक तौर पर ’बम्बईया फ़िलिम’ को एक ऎच्छिक विषय के रूप में शामिल कर लिया।युवाओं में एक नये उत्साह का संचरण हुआ। कुछ तो अपनी कंघी निकाल अपने अपने बाल सेट करने लगे कुछ लड़कियां ’गोरे गोरे मुखड़े पर काला काला चश्मा’ लगाने लगीं और कुछ छात्र ’वाह रे करिश्मा’ गाने लगे।नये पाठ्यक्रम की नई शुरुआत।’रजत-पट’ पर नये ’टेक्स्ट बुक’ लिखे जाने लगे ।कुछ प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छाप-छाप कर ’रजत(चाँदी) काटने लगे।कुछ हमारे जैसे बैठे-ठाले निठ्ठल्लुआ लेखक उन ’टेक्स्ट-बुक’ की कुंजी लिखने लग गये और भाग्य की कुंजी खोजने लग गये।कुछ लोग फ़िल्मों के संभावित प्रश्न और उत्तर और ’गेस-पेपर’ छापने में लग गये। कुछ शिक्षा विभाग में सक्रिय हो गये कि पाठ्य पुस्तकों में उनकी भी ’फ़िल्म’ शामिल कर ली जाय जो भले ही ’बाक्स-आफ़िस’ पे भले ही पिट चुकी हो ।कोर्स में लग जायेगी तो उद्धार हो जायेगा उधार निपट जायेगा। मरणोपरान्त का क्या भरोसा !वह जानता है कि एक बात पाठ्यक्रम में घुस गई तो अमर हो जायेगी यही फ़िल्म। हम क्या गलत कर रहें हैं? हिन्दी के बहुत से लेखक भी तो यही करते हैं। फिर यही पीढ़ी देख-देख (पढ-पढ़ )कर जवान होगी । शोध होगा चर्चा होगी सेमिनार होगा । हो सकता है कि इस फ़िल्म के तकनीकि पहलुओं के अध्ययन हेतु विदेश यात्रा का योग बने जैसे हमारे कुछ स्वनामधन्य साहित्यकारों ने ’विश्व-हिन्दी-सम्मेलन’ भारत में न कर ’न्यूयार्क. मे किया कि हिन्दी पल्लवित हो गई। फिर अमेरिका की धरती से पता चला कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये "इंडिया" में अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है । विश्व भाषा बनानी है तो विश्व-भ्रमण करना ही पड़ेगा। ******* सत्र प्रारम्भ हो गया। कक्षायें शुरू हो गईं।नया नया पाठ्यक्रम है । अभी प्रशिक्षित अध्यापकों का टोंटा है। एक दो ’मास्साब’ से ही कार्य चलाना है ,कोर्स उठाना है। एक मास्टर साहब वयोवृद्ध हैं ,गांधी टोपी लगाते हैं ,बन्द गले का कोट पहनते हैं।पौराणिक काल के लगते हैं ।कालेज प्रशासन ने उन्हें ’धार्मिक’ पौराणिक एवं ऐतिहासिक फ़िल्में पढ़ाने का दायित्व सौंपा है।सप्ताह में 3 क्लास लेना है ।जब वो धार्मिक फ़िल्म ’सती अनसूईया’ व ’राम वनवास’ आदि पढ़ाते हैं तो भाव-विभोर हो जाते हैं।आंखें बन्द कर तल्लीन हो जाते हैं कि ...कैसे भगवान राम अयोध्या का सिंहासन छोड़...कैसे सीता मईया भगवान राम के साथ..घर ते निकसी रघुबीर बधु ,,..धरि धीर दिए मग में डग द्वै....कि उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकल पड़ती है। गुरु जी की इस ’चक्षु-मूँदन’ क्रिया का उचित लाभ उठा कर कुछ नवयुवक विद्दार्थी क्लास छोड़ ’कैन्टिन-गमन’करने लगते थे ।जब राम जी ’वन-गमन’ से लौटेंगे तो यह भी अपनी क्लास में लौट आयेंगे। परन्तु जो प्रागैतिहासिक व पौराणिक काल की छात्रायें हैं वो बड़े ही मनोयोग व श्रद्धा भाव से सर पर ओढनी रख कर ’सीता-हरण’ का लेक्चर अटेन्ड करती हैं और अपनी अभ्यास पुस्तिका में रह रह कर कुच नोट करती रहती हैं।यद्दपि ऐसे क्लास में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति प्राय: नगण्य ही होती है ।परन्तु जब रोमान्टिक फ़िल्मों का ’उदभव और विकास’ पढ़ाया जाता है तो उपस्थिति आवश्यकता से अधिक सन्तोषजनक रहती है। अध्यापक महोदय भी युवा किस्म के हैं।सलीके से बाल निकाल कर आते हैं। जीन्स पैन्ट व टी-शर्ट पहनते हैं । ’गागल्स’ सर पर रख लेते हैं मस्तिष्क प्रदेश पर। जिस फ़िल्म पर व्याख्यान देना होता है देर रात तक देख कर आते हैं ,फिर सुबह विस्तार से समझाते हैं। प्रेम क्या है ? प्रेम के स्वरूप क्या है?उसके प्रकार क्या हैं? उसकी परिभाषा क्या है? बीच बीच में अपने कथन की पुष्टि हेतु युगल-गीत भी-सस्वर..भाव-भंगिमापूर्ण ।लौकिक ,दैहिक व अलौकिक प्रेम क्या है? अमुक फ़िल्म में प्रेम के त्रिकोण में तीसरा कोण कहाँ था? कुछ जीन्स धारिणी छात्रायें अपना त्रिकोण खोजने लगती थीं। गुरु जी विस्तार से समझाते हैं कि अमुक फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान ने कहाँ लचर ऐक्टिंग की है ।यदि इस फ़िल्म में वो हीरो होते तो वो फ़िल्म बाक्स-आफिस पर यूँ न पिटती। हम पिट जाते वो अलग बात है।प्रेम विषयक फिल्मों पर विशेषत: प्रणय-आलिंगन-चुम्बन जैसे दृश्यों पर इनके गहरी पकड़ है संभवतया गहरा अनुभव भी है।यद्दपि ’समानान्तर -सिनेमा’ का विषय भी इनको पढ़ाना है ,परन्तु इस विषय की न इनको विशेष जानकारी है न ही कोई विशेष अभिरुचि।मुम्बई से गेस्ट फ़ैकेल्टी बुला लिए जायेंगे। बहुत से डाइरेक्टर निठ्ठल्ले खाली बैठे रहते है साल-ओ-साल इस काम के लिए। कुछ ’मास्साब’ तो कक्षा में अभिनय सहित ही प्रवेश करते हैं -गब्बर स्टाईल में । ठक !ठक !! ठक !!! अब छड़ी नहीं बेल्ट निकालत हैं फिर पूछते हैं---" कितने बच्चे हैं आज ?आँय !अरे रमुवा ! कल क्लास छोड़ कर कहाँ भाग गया था ?अयं क्या सोच कर भागा था कि सरदार बहुत खुश होगा???तेरा अटेनडेन्स लगा देगा?? हराम ...... कुछ मास्टर साहब अपने अपने क्लास में आगामी परीक्षा में पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों की तैयारी करवा रहे थे। उदाहरणत: -’मेरा गाँव मेरा देश"-से क्या शिक्षा मिलती है? -राम तेरी गंगा मैली ’ -में गंगा कहां आकर मैली हो जाती है? -’परजानियां ’ फ़िल्म गुजरात में क्यों प्रदर्शित नहीं हो सकी? किन्हीं 2-कारणों पर प्रकाश डालते हुए सविस्तार व्याख्या करें -’जोधा-अकबर-फिल्म पर विवाद के मुख्य विन्दु क्या हैं? सोदाहरण प्रस्तुत करें। -फ़िल्म रिलीज होने के पूर्व विवाद में फंस जाने से क्या क्या फायदे होते हैं ? स्पष्ट करें छात्र -छात्राओं ने सोचा , पाठ्यक्रम की तैयारी करनी है तो नियमित व ध्यान से फिल्म देखना ही पड़ेगा। अंक जो उठाना है । [व्यंग्य अभी जारी है ......] आनन्द पाठक ०९४१३३९५५९२

शनिवार, 6 जुलाई 2013

एक कहावत : भैस के आगे बीन बजाना......

एक कहावत : भैस के आगे बीन बजाना......

हिन्दी में एक कहावत है -"भैस के आगे बीन बजा--भैस खड़ी पगुराय

बहुत प्रचलित कहावत है..सभी परिचित होंगे। इस मुहावरे के कई वर्ज़न मिलते है..लोकोत्तियों और मुहावरों की किताबों में मगर भाव बोध एक ही होता है ।कुछ वर्ज़न यहाँ लगा रहा हूँ [और तरह से भी क्षेत्रानुसार प्रयोग होता होगा- अमेरिका में मालूम नहीं]


1) "भैंस के आगे बीन बजाये, भैंस लगी पगुराय"

2) "भैंस के आगे बीन बजाये, भैंस खड़ी पगुराय"

3) "भैंस के आगे बीन बजाये, भैंस बैठ पगुराय"

4) "भैंस के आगे बीन बजाये, भैंस रही पगुराय"

अब इसमें मानक ’वर्ज़न’ कौन है? अगर चारो सही है तो ज़्यादा ’सही’ कौन सा है?

जिस महापुरूष में इसकी रचना की होगी -उन्होंने "भैंस’ हो क्यों चुना..’पगुराती’ तो गाय भी है ,,’पगुराता’ तो ऊँट भी है ’बैल भी है..साँड़ भी है । कुछ ’विद्वान’ भी पगुराते हैं जो एक ही बात को फेंटते रहते है और ’मुख-सुख’ करते रहते हैं और मैं ’विद्वान’ नहीं हूं

ऊपर के चारो विकल्प में से सही स्थिति कौन सी हो सकती है? अगर आप की दृष्टि में चारो सही है तो आप ’कौन बनेगा करोड़पति’- ईकविता के प्रथम विजेता होंगे

’पगुराना’-एक आत्मसन्तोष आत्ममुग्ध ,आस-पास के वातावरण से निस्पॄह अवस्था में स्वयं में तल्लीन मुद्रा मे मुख सुख की क्रिया है जिसमे वो इतना तल्लीन रहता है कि फिर उसे ’बीन’ बजे या या बिस्मिल्ला खान की शहनाई ..कोई आनंद नहीं ।और यह आनन्द क्रिया का भोग ज़्यादे देर तक ’खड़े’ होकर नहीं किया जा सकता.कुछ देर बात थकन की स्थिति बन सकती है

अगर ’लगी पगुराय’ पकड़ते हैं तो भी बात बनती नज़र नहीं आ रही है। मतलब कि ’बीन बज़ने के बाद’ भैस’ ने कुछ समझने की कोशिश की .समझ में नहीं आया तो फिर ’पगुराने लगी"

अगर ’बैठ पगुराय’ पकड़ते है तो बात कुछ कुछ बनती नज़र आ रही है ..आराम से अपने आप में खोये-खोये /अपने आप में लीन

रहने की स्थिति बन रही है गोया ऐसे में ’बीन बजाने या सुनने का क्या फ़ायदा? जिस बीन पर साँप जैसा प्राणी भी नाचने लगता है..’भैस को कोई फ़र्क नहीं पड़ता? पढ़ने में भी [काला अक्षर भैस बराबर] और सुनने में भी [भैस के आगे बीन बजाय..] फिर भी लोग ऐसे जानवर के लिए लठ्ठम-लठ्ठा क्यों किए रहते हैं [जिसकी लाठी ,उसकी भैंस]

ख़ैर..

रही पगुराय -की स्थिति भी देख लेते हैं? वो तो पहले से ही ’पगुराय ’ रही थी .बीन बज़ाने पर भी उस पर कोई असर /क्रिया/प्रतिक्रिया नहीं हुई उसने तो गर्दन घुमा कर भी या कान उठा कर भी नहीं देखा न ध्यान दिया कि बीन कौन बजा रहा है और किधर बजा रहा है। अपने काम से काम ..भाड़ में जाय बीन और बीन बजाने वाला।

अब पाठको से एक सवाल

1] कहावत कहने वाले [आदि पुरुष] ने इस कहावत के लिए ’भैस’ ही क्यों चुना? गाय .बैल ऊँट क्यों नहीं [गधा पगुराई नहीं करता है .सिर्फ़ काम करता है]

2] इस कहावत में ’बीन’ ही वाद्य-यन्त्र क्यों चुना ? शहनाई ढोल मजीरा ताशा क्यों नहीं?

3] आगे से ही बीन बजाने की बात क्यों की गई है? अगर पीछे से बजाते तो क्या होता?

उत्तरापेक्षी
-आनन्द.पाठक
09413395592

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